
- इस समय लखनऊ विश्वविद्यालय में नए कुलपति के आने से ज्यादा अब चर्चा विश्वविद्यालय के उन शिक्षकों की हो रही है जिन्होंने ख़ास की तरह प्रोफेसर आलोक कुमार के साथ कार्य किया और उनके निर्देशों का पालन किया .
लखनऊ, 28 जुलाई , लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर आलोक कुमार राय की विदाई हो गई है लेकिन यह तय मानिए कि नए कुलपति की नियुक्ति होने तक प्रोफेसर आलोक कुमार राय की ख़ास लाबी के शिक्षकों के रुतबे और कद में किसी प्रकार की कमी नहीं आने वाली है . इसकी सीधी वजह एक प्रोफ़ेसर ने बताई , उन्होंने कहा कि प्रभारी कुलपति प्रोफ़ेसर मनुका खन्ना की प्रशासनिक क्षमता और सूझबूझ सभी जानते हैं और उनकी लाबी भी शिक्षक जानते हैं .
विश्वविद्यालय से जुड़े सब लोग जानते हैं कि प्रोफेसर आलोक कुमार राय की ख़ास लाबी के शिक्षकों ने प्रोफेसर राय के हर कदम का न केवल स्वागत किया बल्कि उसे कानूनी अमली जामा पहनाकर आगे बढ़ाया . लखनऊ विश्वविद्यालय और उसे जुड़े महाविद्यालय में परीक्षा, प्रवेश और नियुक्तियों को लेकर समय-समय पर उठी आपत्तियां और आवाज को दबाने का काम इन्हीं रसूखदार शिक्षकों ने किया जिन्हें कुलपत का खास माना जाता है .
अब प्रोफेसर आलोक कुमार राय के आईआईएम कोलकाता के निदेशक बनने के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया राजभवन की ओर से शुरू की जा चुकी है. इसमें पात्र व्यक्तियों से कुलपति पद के लिए आवेदन मांगे गए हैं और आवेदन प्राप्त होने के बाद आगे की प्रक्रिया बढ़ाई जाएगी. लेकिन इस समय लखनऊ विश्वविद्यालय में नए कुलपति के आने से ज्यादा अब चर्चा विश्वविद्यालय के उन शिक्षकों की हो रही है जिन्होंने ख़ास की तरह प्रोफेसर आलोक कुमार के साथ कार्य किया और उनके निर्देशों का पालन किया .
इनमें एक शिक्षक तो ऐसे भी हैं जिन्होंने सहायता प्राप्त डिग्री कॉलेजों में शिक्षकों की नियुक्ति का अनुमोदन करने के लिए नियमों से परे जाकर कार्य किया जबकि संबंधित प्रबंधतंत्र ने नियुक्तियों की पारदर्शिता और निष्पक्षता की गवाही दी थी बावजूद इसके लखनऊ विश्वविद्यालय में बिना तय तोड़ किये अनुमोदित नहीं किया गया . इन शिक्षक महोदय का कार्य केवल इतना ही नहीं है . इन्होंने बड़े पैमाने पर महाविद्यालयों के रूटीन के कामकाज को भी प्रभावित किया और यह सिलसिला इतना ज्यादा चला कि शिक्षक संगठनों को भी आगे आने के लिए मजबूर होना पड़ा. माना जा रहा है कि इस माहौल में भी उनका काम जारी रहेगा .
इसी तरह से एक दूसरे प्रोफेसर साहब कानून के रखवाले माने जाते हैं, लेकिन उन्होंने कानून से परहेज कर कार्य करने में कोई संकोच नहीं किया. शिक्षकों की रहनुमाई करने वाले शिक्षक नेता भी प्रोफेसर आलोक कुमार राय की गुडबुक में बन रहे और बने रहने के दौरान ही उन्होंने ऐसे ऐसे कार्य किया कि उनके साथी भी विरोध करने लगे.
लखनऊ विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ प्राध्यापक की माने तो विश्वविद्यालय परिसर में शिक्षकों और विद्यार्थियों को अधिक से अधिक सुविधाएं प्रदान करने के मामले ऊपरी तौर पर देखने में तो अच्छे लगते हैं लेकिन जमीनी हकीकत अधिक कड़वी है और यह उन शिक्षकों के लिए कड़वी है जो विश्वविद्यालय के कुलपति के खेमे के नहीं माने जाते हैं.
एक बड़ा सवाल है ऐसे ही ख़ास शिक्षकों के प्रमोशन हुए , प्रोनान्तियाँ दी गई और विभाग अध्यक्ष के रूप में विभूषित किया गया. सवाल दर सवाल विश्वविद्यालय के शिक्षक उठाते रहे हैं और उनके प्रतिनिधि संगठन भी उठते रहे हैं लेकिन कभी प्रभाव में तो कभी शिक्षकों की एकता के अभाव में वह आवाज किसी कोने में दब कर रह गई .
अब लखनऊ विश्वविद्यालय के शिक्षक यह मान कर चल रहे हैं कि अगला कुलपति आने तक प्रोफ़ेसर आलोक राय की समर्थक टीम के सहारे विश्वविद्यालय के कामकाज को संचालित किया जाएगा . संभंव है कि मार्गदर्शन भी लिया जाय ? अब तक सक्षम होते हुए अनदेखा किए गए शिक्षकों को भी मुख्य धारा में मिलकर कुछ प्रशासनिक कुछ शैक्षिक और कुछ वित्तीय कामकाज दिए जा सकते है यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि लखनऊ विश्वविद्यालय का कामकाज कैसा होगा ?
