
- गुरमति साहित्य में ब्रज भाषा का प्रभाव विषयक संगोष्ठी का आयोजन.
लखनऊ, 18 फरवरी , campus samachar.com, लखनऊ के इन्दिरा भवन में आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं द्वारा संदेश दिया गया कि गुरमति साहित्य में सामाजिक एकजुटता के लिए पंजाबी और उत्तर भारत की स्थानीय भाषाओं का प्रयोग किया गया। अकादमी के कार्यक्रम संयोजक अरविन्द नारायण मिश्र ने संगोष्ठी में उपस्थित सम्माननीय वक्ताओं को अंगवस्त्र और स्मृतिचिन्ह भेंट कर सम्मानित भी किया।
संगोष्ठी में आमंत्रित वरिष्ठ पंजाबी लेखक नरेन्द्र सिंह मोंगा ने कहा कि गुरु नानक साहिब ने अपने समय की परिस्थितियों का वर्णन करते हुए अपनी व्यथा प्रकट की थी कि ‘‘खत्रीआ त धरमु छोडिआ मलेछ भाखिआ गही” और ‘‘घरि घरि मीआ सभनां जीआं बोली अवर तुमारी”। अर्थात क्षत्रिय अपना धर्म छोड़कर म्लेच्छ धर्म और भाषा को अपना रहे हैं और घर घर में मियां और बेगानी भाषा स्थान ले रही है। ऐसी स्थिति में उन्होंने, गुरमति साहित्य की भाषा के लिए सामाजिक एकजुटता के लक्ष्य को ध्यान में रखकर पंजाबी और उत्तर भारत की स्थानीय भाषाओं मुख्यतः ब्रजभाषा, अवधी, खड़ी बोली आदि की मिश्रित संत भाषा का प्रयोग किया और लिपि हेतु ब्राह्मी लिपि से विकसित लेंहदी लिपि को चुना जो परिष्कृत हो कर गुरुमुखी बन गई।
वरिष्ठ पंजाबी लेखक दविन्दर पाल सिंह “बग्गा” ने कहा कि वास्तव में गुरमत साहित्य का तात्पर्य गुरु ग्रंथ साहिब के सभी वाणी कारों की वाणी, गुरु गोविंद सिंह की वाणी और भाई गुरदास की रचनाओं से है। गुरु ग्रंथ साहब में वर्णित वाणीकारों में सिख धर्म के छह गुरु साहबान के अलावा 15 भक्त जनों की वाणी भी सम्मिलित है। विशेष कर कबीर, रविदास, नामदेव आदि। इन सब भगतों, वाणीकारों की वाणी में पूर्वांचल की बोली और ब्रज भाषा का बहुत ही अधिक प्रभाव है।
उदाहरण के तौर पर गुरु गोबिंद सिंह का एक सवैया, जिसकी अंतिम पंक्ति ‘‘साच कहौं सुन लेहु सबै जिनि प्रेम कियो तिनहीं प्रभु पायो‘‘ विश्व प्रसिद्ध है। नवयुग कन्या महाविद्यालय, के दर्शनशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष मेजर (डॉ) मनमीत कौर सोढी ने कहा कि गुरमति साहित्य पर ब्रज भाषा का प्रभाव सिख धर्म की समावेशी प्रवृत्ति को दर्शाता है।
सिख गुरुओं ने धर्म, भक्ति और वीर रस से ओतप्रोत ग्रंथों में ब्रज भाषा का उपयोग किया, जिससे उनके संदेश अधिक प्रभावी और जनसुलभ बने। यह प्रभाव विशेष रूप से गुरु ग्रंथ साहिब, दशम ग्रंथ और अन्य ऐतिहासिक सिख ग्रंथों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जो सिख धर्म और भक्ति आंदोलन के पारस्परिक सम्बन्ध को दर्शाती है।
ब्रज भाषा ने गुर वाणी को सरल, मधुर और प्रभावी बनाया, जिससे यह जनसाधारण तक आसानी से पहुँच सकी। गुरु नानक देव ने भी भक्ति रस में भरी सहज भाषा में अपने उपदेश दिए। गुरु गोबिंद सिंह जी की ब्रजभाषा रचनाओं में वीर रस का प्रभाव दिखता है।
गुरु गोबिंद सिंह के प्रसिद्ध दरबारी कवि भाई नंदलाल जी की कई रचनाएं ब्रजभाषा में थी। गुरबिलास ग्रंथ और सूरज प्रकाश ग्रंथ में भी ब्रजभाषा की झलक मिलती है। गुरु अर्जन देव जी ने जब गुरु ग्रंथ साहिब का संकलन किया तब उन्होंने भक्त कबीर, नामदेव, सूरदास और रविदास आदि संतों की वाणियों को सीमाओं से ऊपर उठकर संकलन किया। इस प्रक्रिया में ब्रज भाषा भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकी।
ब्रज भाषा ने गुरमति साहित्य को एक अद्वितीय भाषा-शैली और अभिव्यक्ति प्रदान की। गुरमति साहित्य को एक विशेष प्रवाह, माधुर्य, गेयता और प्रभावशीलता प्रदान की, जिससे यह साहित्य केवल विद्वानों तक सीमित न रहकर जनमानस तक पहुँचा।
इससे सिख धर्म के मूल सिद्धांत जैसे एकेश्वरवाद, सेवा, भक्ति आदि अधिक प्रभावशाली रूप से प्रचारित हो सके।
युवा पंजाबी विदुषी रनदीप कौर ने कहा कि ब्रज भाषा हिंदी साहित्य के काव्य की सबसे समृद्ध भाषा है, जिसका उपयोग 13 वीं शताब्दी के अंत में संत कवियों ने सर्वाधिक उपयोग किया है।
गुरमत साहित्य में भी इसकी झलक आम तौर पर देखने को मिल जाती है चाहे गुरु ग्रंथ साहिब में लिखे गए श्री गुरु तेग बहादुर, भक्त सूरदास और भक्त कबीर जी के श्लोक हो या श्री गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा रचित महाकाव्य ग्रंथ दशम ग्रंथ ही क्यों ना हो, ब्रज भाषा का इससे उत्कृष्ट उदाहरण कहीं और मिल ही नहीं सकता। कार्यक्रम में मुख्य रूप से अरविन्द नारायण मिश्र, मीना सिंह, अंजू सिंह, महेन्द्र प्रताप वर्मा सहित पंजाबी संगत उपस्थित रही।
