
- पत्र में कहा गया है कि FUPUCTA) का गठन प्रदेश के विश्वविद्यालयों के अंतर्गत आने वाले महाविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों की समस्या निवारण के लिए उनकी आवाज और प्रोन्नति के लिए प्रयास का संगठित रूप बनाने के लिए किया गया। इसे प्रदेश के शिक्षकों के मांग की आत्मा के रूप में जागृत होना होगा पर जब उस आत्मा को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार समय पर न मिले, तो यह केवल संगठनात्मक चूक नहीं, शिक्षक-स्वाभिमान और लोकतंत्र की अवमानना बन जाती है।
लखनऊ , 19 जुलाई , उ०प्र० विश्वविद्यालय महाविद्यालय शिक्षक महासंघ -फुपुक्टा (Federation Of U.P. University & College Teacher Association -FUPUCTA) के चुनाव को लेकर प्रदेश के शिक्षक मुखर होने लगे हैं वे संगठन को मजबूत बनाने के लिए चिंतित है ताकि शिक्षकों की समस्याओं का समाधान हो सके. संगठन चुनाव के लिए संगठन के पदाधिकारियों को पत्र लिखा गया है और आजकल ये चर्चा में है.
पत्र में कहा गया है कि उ०प्र० विश्वविद्यालय महाविद्यालय शिक्षक महासंघ (Federation Of U.P. University & College Teacher Association -FUPUCTA) का गठन प्रदेश के विश्वविद्यालयों के अंतर्गत आने वाले महाविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों की समस्या निवारण के लिए उनकी आवाज और प्रोन्नति के लिए प्रयास का संगठित रूप बनाने के लिए किया गया। इसे प्रदेश के शिक्षकों के मांग की आत्मा के रूप में जागृत होना होगा पर जब उस आत्मा को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार समय पर न मिले, तो यह केवल संगठनात्मक चूक नहीं, शिक्षक-स्वाभिमान और लोकतंत्र की अवमानना बन जाती है।
वर्ष 2022 में जब उ०प्र० विश्वविद्यालय महाविद्यालय शिक्षक महासंघ के प्रदेश संगठन का चुनाव हुआ था, तो LUACTA की अधिसूचना से पहले ही जुलाई में चुनावी प्रक्रिया का श्रीगणेश हो चुका था और 24 सितंबर को मतदान सम्पन्न हुआ। वह दिन केवल एक चुनाव नहीं था—वह शिक्षक चेतना का उत्सव था, लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का निर्वहन था, और इस विश्वास का साक्षात प्रमाण था कि हम अपने प्रतिनिधि खुद चुन सकते हैं, समय पर चुन सकते हैं, और अपनी बात लोकतंत्र की ज़मीन पर रख सकते हैं।
पर आज, जब तीन वर्ष बीत चुके हैं और जुलाई माह चल है, तो यह चिंता व्याप्त है कि कहीं चुनाव की अधिसूचना में देरी न हो जाए। यह देरी केवल तिथियों का सरकना नहीं है—यह विचारों का विलंब है, प्रतिनिधित्व की निष्क्रियता है, और संगठन के जीवंत स्वरूप का मौन हो जाना है। जब चुनाव समय पर नहीं होते, तो संगठन अपने उद्देश्य से भटकने लगता है, संवाद ठहर जाता है, और समस्याओं का समाधान हाशिए पर चला जाता है।
जो शिक्षक वर्ग उच्च शिक्षा से प्रदेश और देश का निर्माण करता है, मार्गदर्शन करता है, गुणवत्ता और मूल्यांकन का पहरुआ बनता है, वही यदि अपने ही संगठन में लोकतंत्र से वंचित हो जाए, तो यह विडंबना नहीं, त्रासदी है। यह एक ऐसी स्थिति है, जहाँ संगठन तो रहेगा, लेकिन वह “प्रतिनिधि” नहीं रहेगा—वह केवल प्रतीक बन जाएगा। FUPUCTA का चुनाव समय पर न हुए तो केवल एक चुनाव की देरी नहीं, प्रदेश के शिक्षकों की आवाज़ को अगोचर बना देगा । इससे न केवल प्रोन्नति, स्थानांतरण, सेवा शर्तों और समस्याओं के निराकरण की प्रक्रिया प्रभावित होगी, बल्कि उच्च शिक्षा की संपूर्ण गुणवत्ता भी धूमिल हो सकती है।
जब शिक्षक स्वयं असंगठित, अपारदर्शी या असमर्थ महसूस करेगा, तब वह समाज को क्या दिशा देगा? आज आवश्यकता है कि चुनाव की अधिसूचना तुरंत जारी हो, चुनाव कार्यक्रम समयबद्ध हो, और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी ढंग से संपन्न हो। यह केवल एक संगठन की औपचारिकता नहीं है, यह उस शिक्षक वर्ग की गरिमा की पुनः पुष्टि है, जो ज्ञान, मूल्य और विचारों का वाहक है।
पत्र के अंत में कहा गया है कि यह चुनाव नहीं, शिक्षक स्वाभिमान का पुनः उद्घोष है। हमें विश्वास है कि फुपुक्टा के माननीय पदाधिकारीगण इस संवेदनशील विषय को केवल मांग-पत्र नहीं, बल्कि प्रदेश के शिक्षकों की पीड़ा, चेतना और लोकतांत्रिक विश्वास के रूप में ग्रहण करेंगे, और समय पर अधिसूचना जारी कर एक उदाहरण प्रस्तुत करेंगे—कि जहाँ शिक्षक होंगे, वहाँ लोकतंत्र की लौ कभी मंद नहीं होगी।
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