
सद्भावना दिवस विशेष:
दुर्ग भिलाई , 19 अगस्त , हिन्दू जहां अपने आराध्य को मंदिरों में पाते हैं, वहीं मुस्लिम उन्हे मस्जिदों में, सिख उन्हे गुरुद्वारों में तो ईसाई उन्हें चर्च में महसूस करते हैं। किन्तु परम सत्य यह है कि ईश्वर एक है, भले ही आस्थावश लोग उन्हें भिन्न भिन्न रूपों में देखते हैं। काष्ठ शिल्प के चितेरे कलाकार श्रवण चोपकर ने अपनी कृति “सबका मालिक एक” के माध्यम से यही कहने का प्रयास किया है।
सागौन लकड़ी के दो फीट ऊंचे, डेढ़ फीट चौड़े तथा चार इंच मोटे (2′ x 1-1/2′ x 4″) एक ब्लाक को बिना काट-पिट किए महज तराशकर चार माह के अथक परिश्रम से बनाई गई कृति वास्तव में “फोर इन वन” है। जोड़ रहित (Jointless ) होने के बावजूद कृति को अलग अलग ढंग से फोल्ड कर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा एवं चर्च का रूप देना संभव है। कृति को जब सामने से देखा जाए तो मंदिर के दर्शन होते हैं। परंतु इसके ठीक पीछे दुसरी ओर की सतह को बहुत ही खूबसूरती से चर्च का रूप दिया गया है। मंदिर तथा चर्च के बीच मोटाई वाले हिस्से में गुरुद्वारा के प्रतीक चिन्ह “खण्डा साहिब” तथा मस्जिद के उपर के प्रतीक चिन्ह “चांद -तारा” को मात्र घुमाकर आवश्यकतानुसार छिपाया अथवा प्रदर्शित किया जा सकता है। कृति के मोटाई में छिपे प्रतीक चिन्ह खण्डा साहिब को मात्र घुमाकर ऊपर कर देने से मंदिर के स्थान पर गुरुद्वारा के दर्शन होने लगते हैं। कृति को मस्जिद का रूप देने हेतु मंदिर के दोनों बाजू वाले स्तंभों को ऊपर कर दिया जाता है।
मंदिर के स्तंभ अब मस्जिद की मीनार बन जाते हैं। तत्पश्चात मोटाई में छिपे प्रतीक चिन्ह चांद -तारा को घुमाकर ऊपर कर दिया जाता है। इसके साथ ही कृति मस्जिद का रूप ले लेती है। अर्थात भगवान, अल्लाह, वाहेगुरु तथा गाड एक ही परमात्मा के अलग अलग रूप है।
दुसरे शब्दों में कृति “हिन्दू, मुस्लिम, सिख एवं ईसाई सभी जन एक है” का भौतिक माडल है। एक ओर जहां धर्म के नाम पर स्वार्थी तत्व लोगों में विद्वेष फैला रहे हैं वहीं दूसरी ओर श्रावण चोपकर ने अपनी कलाकृति के माध्यम से सद्भावना दीप प्रज्ज्वलित कर लोगों को एकता के सुत्र में पिरोने का अद्भुत एवं सराहनीय कार्य किया है
