
- सीएमएस एजुकेशन सर्वेक्षण (CMS), राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) के 80वें दौर का हिस्सा है, जोकि विशेष रूप से स्कूली शिक्षा में वर्तमान में नामांकित छात्रों के घरेलू खर्च पर केंद्रित था।
नई दिल्ली , 26 अगस्त , भारत सरकार ने शिक्षा पर व्यापक मॉड्यूलर सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी कर दी है. इस सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य स्कूली शिक्षा और प्राइवेट कोचिंग पर होने वाले औसत खर्च का राष्ट्रीय स्तर पर अनुमान लगाना था. केंद्र सरकार की ओर से किए गए व्यापक मॉड्यूलर सर्वेक्षण (CMS) में कुछ चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं। सर्वेक्षण में यह पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की पकड़ मजबूत बनी हुई है, जबकि शहरी छात्रों में निजी कोचिंग की मांग लगातार बढ़ रही है। इस सर्वेक्षण के मुताबिक, लगभग एक-तिहाई स्कूली छात्र निजी कोचिंग लेते हैं और यह प्रवृत्ति शहरी क्षेत्रों में ज्यादा आम है।
आइए जानते हैं कि सीएमएस रिपोर्ट में और क्या-क्या सामने आया है. शहरों और गांवों में कितने छात्र पढ़ रहे हैं. ये छात्र प्राइवेट कोचिंग में कितना खर्च करते हैं. इसे विस्तार से समझते हैं.
Government Schools: सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि सरकारी स्कूल पूरे देश में शिक्षा देने में अहम योगदान देते हैं। कुल नामांकन में सरकारी स्कूलों का हिस्सा 55.9 प्रतिशत है। यानी कुल नामांकनों में से 55.9% नामांकन सरकारी स्कूलों में हैं। दूसरी ओर, निजी गैर-सहायता प्राप्त (मान्यता प्राप्त) स्कूलों में देश भर में कुल नामांकन का 31.9 प्रतिशत हिस्सा है। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी सरकारी स्कूलों की पकड़ शहरों की तुलना में अधिक है। इसमें कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों में 66% नामांकन है, जबकि शहरों में यह 30.1% है।
शहरों के बच्चे कोंचिंग लेना कर रहे पसंद
सर्वेक्षण में पाया गया कि लगभग एक तिहाई छात्र (27.0 प्रतिशत) चालू शैक्षणिक वर्ष के दौरान निजी कोचिंग ले रहे थे या ले चुके थे। यह प्रवृत्ति ग्रामीण क्षेत्रों (25.5 प्रतिशत) की तुलना में शहरी क्षेत्रों (30.7 प्रतिशत) में अधिक आम थी।
सर्वे के लिए 52,085 परिवारों और 57,742 छात्रों का डेटा लिया गया
सीएमएस एजुकेशन सर्वेक्षण (CMS), राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) के 80वें दौर का हिस्सा है, जोकि विशेष रूप से स्कूली शिक्षा में वर्तमान में नामांकित छात्रों के घरेलू खर्च पर केंद्रित था। कंप्यूटर-सहायता प्राप्त व्यक्तिगत साक्षात्कार (सीएपीआई) के माध्यम से इस सर्वेक्षण में 52,085 परिवारों और 57,742 छात्रों ने भाग लिया। सर्वेक्षण का परिणाम इनसे प्राप्त डेटा के आधार पर तैयार किया गया है।
शहरों में निजी कोचिंग का खर्च गांवों से लगभग दोगुना
रिपोर्ट में बताया गया है कि शहरी क्षेत्रों में प्रति छात्र निजी कोचिंग पर औसत वार्षिक घरेलू खर्च ग्रामीण क्षेत्रों 1,793 रुपये की तुलना में अधिक था। शहरों में कोचिंग पर हर छात्र प्रतिवर्ष औसतन 3,988 रुपये खर्च कर रहा है, जबकि गांवों में यह खर्च 1,793 रुपये है। शिक्षा के स्तर के साथ यह अंतर बढ़ता जाता है। शहरी क्षेत्रों में उच्चतर माध्यमिक स्तर पर निजी कोचिंग पर औसत खर्च 9,950 रुपये है, जोकि ग्रामीण क्षेत्रों (4,548 रुपये) की तुलना में काफी अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर कोचिंग की लागत प्रत्येक शिक्षा स्तर के साथ बढ़ती है, जो कि पूर्व-प्राथमिक स्तर के लिए 525 रुपये से लेकर उच्चतर माध्यमिक स्तर के लिए 6,384 रुपये तक है।
95% छात्रों को घर से मिलता है खर्च
भारत में स्कूल की पढ़ाई के लिए खर्च करने वाले 95% छात्रों ने कहा कि उनका पैसा मुख्य रूप से घर के लोगों से ही आता है। यह बात ग्रामीण (95.3%) और शहरी (94.4%) दोनों क्षेत्रों में लगभग एक जैसी है। केवल 1.2% छात्रों ने कहा कि उनकी पढ़ाई के लिए फंडिंग का मुख्य स्रोत सरकारी स्कॉलरशिप है।
वर्तमान सर्वेक्षण 75वें एनएसएस से सीधे तुलना योग्य नहीं
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) द्वारा किया गया अंतिम व्यापक शिक्षा सर्वेक्षण 75वां दौर (जुलाई 2017-जून 2018) था। हालांकि, अधिकारियों ने कहा कि इसके निष्कर्षों की तुलना वर्तमान सर्वेक्षण के निष्कर्षों से सीधे तौर पर नहीं की जा सकती।
शिक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “एनएसएस के 75वें दौर में आंगनवाड़ी केंद्रों को पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के अंतर्गत वर्गीकृत नहीं किया गया था और स्कूली शिक्षा पर व्यय में निजी कोचिंग भी शामिल थी। हालांकि, सीएमएस:ई ने आंगनवाड़ियों को पूर्व-प्राथमिक श्रेणी में वर्गीकृत किया और स्कूली शिक्षा और निजी कोचिंग पर खर्च को अलग से एकत्र और प्रस्तुत किया।” सीएमएस का प्राथमिक उद्देश्य चालू शैक्षणिक वर्ष के दौरान स्कूली शिक्षा और निजी कोचिंग पर औसत व्यय का राष्ट्रीय स्तर पर अनुमान तैयार करना था।
शहरी छात्रों का शिक्षा खर्च ग्रामीणों से कहीं अधिक
सभी प्रकार के स्कूलों में, चालू शैक्षणिक वर्ष के दौरान प्रति छात्र सबसे अधिक औसत व्यय पाठ्यक्रम शुल्क (7,111 रुपये) पर हुआ, जिसके बाद अखिल भारतीय स्तर पर पाठ्यपुस्तकों और स्टेशनरी (2,002 रुपये) पर खर्च हुआ।
सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है, “शहरी परिवार सभी श्रेणियों में काफी अधिक भुगतान कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि शहरी क्षेत्रों में पाठ्यक्रम शुल्क पर औसत व्यय 15,143 रुपये अनुमानित किया गया था, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 3,979 रुपये अनुमानित था। शहरी क्षेत्रों में उच्च व्यय की यह प्रवृत्ति परिवहन, वर्दी और पाठ्यपुस्तकों जैसे अन्य प्रकार के शिक्षा-संबंधी खर्चों के लिए भी स्पष्ट है।”
