
- अध्यक्ष पद के लिए विनीत वर्मा और निवर्तमान महामंत्री अनित्य गौरव के बीच मुकाबला
- महामंत्री पद पर प्रोफ़ेसर राममिलन को मिल रहा शिक्षकों का समर्थन
लखनऊ 30 मई, campus samachar.com, लखनऊ विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के चुनाव चुनाव में भाग्य आजमा रहे उम्मीदवार अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर स्तर प, र जुटे हुए हैं . इस चुनाव में विश्वविद्यालय और शिक्षकों के हित की लड़ाई के बजाय व्यक्तिगत मुद्दों को उठा कर अपना पक्ष मजबूत करने की रणनीति पर काम हो रहा है. लेकिन अब तक इस चुनाव में चल रही विभिन्न गतिविधियों को देखें तो स्पष्ट लग रहा है कि चुनाव में शिक्षक हितों की बात रखने वाले और व्यवहार कुशल उम्मीदवारों को ही जीत मिलने जा रही है . इस चुनाव में कई उम्मीदवार न केवल अपने विभाग के शिक्षकों के साथ सामान्य व्यवहार करते हैं बल्कि पूरे परिसर में उनके व्यवहार और एक शिक्षक के रूप में उनके आचरण को प्रशंसनीय माना जाता है.
लखनऊ विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष पद के लिए मुख्य लड़ाई जहां विनीत वर्मा और निवर्तमान महामंत्री अनित्य गौरव के बीच है तो अजय कुमार भही दावेदारी कर रहे हैं . वही महामंत्री पद पर प्रोफ़ेसर राममिलन का पलड़ा भारी है इसी पद पर डाक्टर अमिता कनौजिया, ममता , भूपेश कुमार , राजेन्द्र वर्मा भही चुनाव लड़ रहे हैं . महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रोफेसर राममिलन पिछले कई दशकों से विभिन्न पदों पर रहकर शिक्षक हितों की लड़ाई लड़ते आ रहे हैं. वे विश्वविद्यालय के विभिन्न प्रशासनिक पदों पर वह काम कर चुके हैं और उनके व्यवहार और उनकी उपलब्धता की सभी शिक्षक सराहना करते हैं. वह प्रशासनिक पद पर रहते हुए भी शिक्षकों के लिए हमेशा उपलब्ध रहते हैं और यही कारण है कि वे शिक्षक और विश्वविद्यालय प्रशासन दोनों के मध्य सेतु का काम करते हैं. . उपाध्यक्ष के तीन पदों के लिए प्रोफ़ेसर मोनीषा बनर्जी , प्रोफ़ेसर सतीश कुमार पाण्डेय समेत छः लोग हैं .
विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ विवागाध्य्क्ष का कहना है कि विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के चुनाव में मतदान करते समय शिक्षक अपने रहनुमा का चुनाव बहुत ही सोच समझकर करेगा . इनका कहना है कि वर्तमान कार्यकारिणी के चाहती तो शिक्षकों की विभिन्न समस्याओं का आसानी से हल निकाला जा सकता था क्योंकि निवर्तमान कार्यकारिणी के प्रमुख पदाधिकारी विश्वविद्यालय प्रशासन के करीबी माने जाते हैं और महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत भी हैं , लेकिन कारण कुछ भी रहे हो , शिक्षकों के हित की लड़ाई की धार कमजोर होती गई और इसका खामियाजा विश्वविद्यालय के शिक्षकों को भुगतना पड़ा .
ऐसे में 31 मई को हो रहे चुनाव में शिक्षक मतदाता अपनी विभिन्न समस्याओं का समाधान चाहते हैं उन्हें नए पदाधिकारियों में भरोसा है कि वह विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ समझौता, वार्ता या फिर आंदोलन के जरिए उनकी लड़ाई लड़ेंगे लेकिन अब असली सवाल यही है कि उनका रहनुमा कौन होगा ?
