

- जैन मिलन समिति के पूर्व उपाध्यक्ष एवं मीडिया प्रभारी दिनेश जैन ने बताया कि उत्तम आर्जव धर्म का पालन तभी होता है ,जब व्यक्ति के अंदर जितनी अधिक सरलता होगी वह उत्तम आर्जव धर्म है ।मन, वचन ,शरीर की कुटिलता को दूर कर मृदुता एवं सरलता का पालन करना ही उत्तम आर्जव धर्म है।
कोरबा , 30 अगस्त , आर्वज स्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में छल- कपट, मायाचार के अभाव रूप, शांतिस्वरूप जो पर्याय प्रकट होती है ,उत्तम आर्जव धर्म कहते हैं ।उत्तम आर्जव भी क्षमा और मार्दव धर्म के समान ही आत्मा का स्वभाव है। कपट से व्यक्ति पहले खुद की नजर में गिरता है फिर परिवार और समाज की नजर में। कुटिलता अधर्म है, इससे दूर रहकर जीवन को सरल और सहज बनाना ही उत्तम आर्जव है।
उक्त विचार बुधवारी बाजार स्थित दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन धर्म के 10 लक्षणों को परिभाषित करने हेतु संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज ,आचार्य श्री 108 समय सागर महाराज एवं आर्यिका रत्न श्री 105 आदर्श मति माताजी के मंगल आशीर्वाद से आर्यिका रत्न श्री 105 अखंड मति माताजी एवं आर्यिका रत्न श्री 105 अभेदमति माताजी के सानिध्य में चातुर्मास के दौरान प्रदूषण पर्व पर जैन मंदिर में विराजमान है ।
उन्होंने अपने प्रवचन की दौरान बताया कि हमें हमेशा सरल परिणामी बनना है। छल-कपट, मायाचारी से बचना है । जो दूसरों को छलता है, उसकी खुद की आत्मा में छाले पड़ जाते हैं। मायाचारी रहित जीवन ,कार्यों की सिद्धि में सफलता देता है ।छल- कपट करने वाला व्यक्ति पहले खुद की नजर में गिरता है और समय आने पर उसकी सच्चाई उसे परिवार की नजरों से भी गिरा देती है ।जब मन, सरल और पवित्र होता तो वाणी अपने आप पवित्र हो जाएगी और यही वाणी की पवित्रता तन को सुंदर बना देती है फिर उसे शरीर से मानव कल्याण की प्रत्येक कार्य में सफलता मिलती है ।यही उत्तम आर्जव धर्म है।
जैन मिलन समिति के पूर्व उपाध्यक्ष एवं मीडिया प्रभारी दिनेश जैन ने बताया कि उत्तम आर्जव धर्म का पालन तभी होता है ,जब व्यक्ति के अंदर जितनी अधिक सरलता होगी वह उत्तम आर्जव धर्म है ।मन, वचन ,शरीर की कुटिलता को दूर कर मृदुता एवं सरलता का पालन करना ही उत्तम आर्जव धर्म है। हमें सदैव सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र का पालन करना चाहिए ।देव- शास्त्र -गुरु का स्मरण करने से उत्तम आर्जव धर्म का पालन होता है। यदि इन तीनों की प्रति समर्पित नहीं हुए,तो मन, वचन, काय की कुटिलता होगी और इसी कुटिलता को दूर करना सरलता का पालन करना ही उत्तम आर्जव है। इसके विपरीत मायाचारी होती है ।व्यक्ति में धर्म, कर्म, व्यापार आदि ऐसा कोई स्थान नहीं है जहां मायाचारी नहीं होती है ।इस प्रकार से हमने धर्म को समझ तो लिया, जान तो लिया लेकिन इसके पालन करने पर ही उत्तम आर्जव धर्म का पालन होता है। कुटिलता ही जीवन के लिए घातक होती है।
इसके भाव छुपे रहकर व्यक्ति विश्वासघात करने लगता है। माया कषाय के अभाव का नाम ही उत्तम आर्जव धर्म है। इस प्रकार से जैन समाज मैं पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म को अच्छे ढंग से समझ कर अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया ।प्रातः काल से ही समस्त जैन समाज के लोगों ने प्रातः 7:00 से ही श्री जी का अभिषेक, शांति धारा एवं पूजन किया ,तत्पश्चात उत्तम आर्जव धर्म पर अखंड मति माताजी द्वारा प्रवचन किया गया। उसके पश्श्चात् तत्वार्थ सूत्र का वाचन किया गया ।शाम की बेला में जैन मिलन समिति के सचिव मनीष जैन एवं सांस्कृतिक प्रभारी अखिलेश जैन द्वारा मोनो एक्टिंग धार्मिक एवं फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता की गई। जिसमें समस्त जैन समाज के लोगों ने बढ़-चढ़कर प्रतियोगिता में भाग लिया ।इस प्रकार से समस्त जैन समाज की समस्त महिलाएं पुरुष एवं समिति के सभी पदाधिकारी उपस्थित हुए । उक्त जानकारी जैन मिलन समिति के पूर्व उपाध्यक्ष एवं मीडिया प्रभारी दिनेश जैन ने दी।
