

- शाला के प्रधान पाठक जयंत सिंह क्षत्रिय ने बताया कि वसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) . बसंत पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं , बल्कि हमारे जीवन में नवीन ऊर्जा, ज्ञान व आत्मिक विकास की अनूठी प्रेरणा का संदेश भी है.
जान्जगीर चांपा , 04 फरवरी, campussamachar.com, शासकीय प्राथमिक शाला एवम पूर्व माध्यमिक शाला अमोरा में सरस्वती पूजा कर बसंत पंचमी मनाया गया. ऋतुओं के राजा वसंत ऋतु ( Basant Panchami ) के माघ महीने के पंचमी ( Basant Panchami ) को पूरे भारत वर्ष में ज्ञान की देवी मां सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में बसंत पंचमी का उत्सव बड़े ही उल्हास पूर्ण वातावरण में मनाया जाता है । इसी क्रम में शासकीय प्राथमिक शाला एवम पूर्व माध्यमिक शाला अमोरा अकलतरा जांजगीर चांपा के छात्र छात्राओं शिक्षक शिक्षिकाओं शाला विकास समिति के सदस्यों एवं मध्याह्न भोजन स्व सहायता समूह के सदस्यों के द्वारा यह उत्सव बड़े ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया गया।
Basant Panchami : सर्वप्रथम शाला विकास समिति के सदस्यों एवं समस्त शिक्षक शिक्षिकाओं सहित छात्र छात्राओं के द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा पर पूजन अर्चना करने के पश्चात सरस्वती वंदना किया गया जिसमे शाला की छात्राएं कु सुभद्रा ,कु आराधना एवं कु पायल के द्वारा मां सरस्वती वीणा वादिनि पर मधुर संगीत से मंत्र मुग्ध कर दिया।तत्पश्चात कक्षा सातवीं की छात्रा कु सुभद्रा के द्वारा बसंत पंचमी उत्सव क्यों और कैसे मनाया जाता है इस पर अपना वक्तव्य दिया जिसमें उसने बताया कि इसी दिन ब्रह्माजी ने मां सरस्वती की उत्पत्ति किया था और इस उत्सव को मां सरस्वती पूजा के रूप में मनाया जाता है।
शाला के प्रधान पाठक जयंत सिंह क्षत्रिय ने बताया कि वसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) . बसंत पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं , बल्कि हमारे जीवन में नवीन ऊर्जा, ज्ञान व आत्मिक विकास की अनूठी प्रेरणा का संदेश भी है, यह वह शुभ दिवस है, जब हम अज्ञान के अंधकार से ज्ञान की प्रकाश की ओर अग्रसर होते हैं, पशुता से मनुष्यता की ओर बढ़ने का संकल्प लेते हैं।
सरस्वती वंदना के इस पावन अवसर पर, आइए हम भी अपने जीवन को पुष्पों की भांति सुगंधित बनाएं-निरंतर देने की भावना रखें, हर्ष और उल्लास से भरें ,और आत्मिक शुद्धता व विवेक का प्रकाश फैलाएं। वसंत पंचमी ( Basant Panchami ) का आध्यात्मिक महत्व इस बात में है कि यह दिन विद्या, बुद्धि, संगीत, और कला की देवी मां सरस्वती के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मां सरस्वती की पूजा करने से ज्ञान, कला, और संगीत का आशीर्वाद मिलता है।
जिस तरह धन की देवी माता लक्ष्मी हैं,शक्ति की देवी माता दुर्गा हैं, उसी तरह विद्या,ज्ञान और बुद्धि की देवी माता सरस्वती को कहा जाता है.
वसन्त ( Basant Panchami ) प्रकृति एवं मानव मन के संयोग का सुन्दर पर्व है। प्रकृति अपने समस्त शृंगार के साथ वसन्त का अभिनन्दन करती है। सुरभित आम के बौर और कोयल की कूक से वसन्त ( Basant Panchami ) के आगमन का संदेश प्रसारित होता है। इस संदेश से मानव मन भी पुलकित एवं पल्लवित हो उठता है। वसन्त मन में नव उमंग व हृदय में सजल भाव को जगाता है। नयी आशाओं एवं कामनाओं को जन्म देता है। सम्भवतः इन्हीं सभी कामनाओं को परिष्कृत और उदात्त करने के लिए सरस्वती पूजन की परम्परा प्रचलित हुई है। सचमुच ही वसन्त उमंग उत्साह और उल्लास तथा बुद्धि विद्या एवं ज्ञान के समन्वय का पर्व है।
महाभारत में व्यासजी ने आराध्य सरस्वती को इस तरह स्मरण किया है-
नारायणं नमस्कृत्यं नरं चैव नरोत्तमं। देवी सरस्वती व्यासं तनो जयमुदीरयते॥
इस तरह देवी सरस्वती का स्वरूप भारतीय संस्कृति में बड़े ही प्रखर और दिव्यता से अंकित हुआ है। एक ओर जहाँ सरस्वती संस्कृति के प्रतिमानों में उतरी है तो वहीं दूसरी ओर भारतीय वैदिक साहित्य से पुराण तथा अन्य धार्मिक साहित्यों में भी उनका स्वरूप दृष्टिगोचर होता है। सरस्वती विद्या और संगीत की सबसे प्राचीन अधिष्ठात्री देवी मानी जाती है। इस तरह वसन्त के इस दिव्य वातावरण में वसन्ती ( Basant Panchami ) छटा एवं ज्ञान के आलोक का समन्वय एक नवीन एवं अमूर्त भाव का सृजन करना है। साहित्य की दृष्टि से हो या लोक उत्सव के परिप्रेक्ष्य में वसन्त मानवता का महान् संदेशवाहक है। वसन्त में उमंगती और पल्लवित नवीन कामनाओं को ज्ञान और विवेक नई दिशा एवं मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। सरस्वती पूजन अंधकार में उजाले, तमस में सक्रियता तथा शुष्क जीवन में आशा एवं उमंग का संचार करते हुए एक नई दिशा देता है।
अतः वसन्त ( Basant Panchami ) हर्षोल्लास का पर्व है जिसमें सरस्वती पूजन, बुद्धि, विद्या और ज्ञान के द्वारा भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करता है। विवेक का प्रज्वलन ही इस पर्व का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। यह संकल्प का पर्व है, मानवता के लिए मर-मिट जाने का पर्व है,जीवन को प्रकृति के साथ एकाकार कर देने का उत्सव है। वसन्त में जीवन आशा उत्साह उमंग से भरा रहे तथा विद्या और बुद्धि का समुचित सुनियोजन होता रहे तभी इस पर्व की सार्थकता सिद्ध हो सकती है।
भगवत् गीता के दशम अध्याय ” विभूति योग ” में भगवान श्री कृष्ण ‘ ऋतूनाम् कुसुमाकर: ‘ की घोषणा कर वसंत ऋतु की श्रेष्ठता घोषित करते हैं ।
ऋतुराज वसंत ( Basant Panchami 2025) के आगमन के साथ ही प्रकृति जीवंत एवं चैतन्यमय हो उठती है। वसंत ऋतु में एक अनूठा लालित्य है। हवा की मस्ती भरी झोंके ही नहीं , गुनगुनी धूप , चंद्रमा की धवल चांदनी , पीली सरसों की मनमोहक चादर ओढ़े हरे-भरे खेत , आम की गदराई मंजरियां , खिलखिलाते फूलों का मोहक सौंदर्य एवं कोयल की कल-कूजन सभी आह्लादकारी लगते हैं। इस कारण वसंत को कविता एवं कला का घर कहा जाता है।
वसंतपंचमी तिथि का विशेष महत्व –
१. ऋग्वेद के अनुसार सृष्टि की रचना के बाद जीव जगत को स्वर देने के लिए ब्रह्मा के आवाहन पर माघ शुक्ल पंचमी तिथि को वीणापाणि भगवती सरस्वती अवतरित हुई थीं और उन्होंने मूक-सृष्टि को स्वर प्रदान की थी।
२. महादेव शंकर ने कामदेव को भस्म कर दिया था। उनकी पत्नी रति के अनुनय-विनय पर शंकर जी ने उसे पुनः जीवनदान वसंत पंचमी को दिया था।
३. माता शबरी द्वारा श्री राम को बेर खिलाने की घटना वसंतपंचमी को ही हुई थी ।
४. जब रावण माता सीता का हरण कर लंका ले गया था , तो बसंतपंचमी के दिन ही प्रभु श्रीराम दक्षिण की तरफ बढ़े थे।
५. द्वापर युग में राधा कृष्ण का प्रथम मिलन वसंत पंचमी ( Basant Panchami 2025) के शुभ दिन हुआ था। इस दिन वृंदावन के श्रीराधा श्यामसुंदर मंदिर में राधा-कृष्ण महोत्सव का भव्य आयोजन होता है।
६. पृथ्वीराज चौहान के आत्म बलिदान की घटना भी वसंतपंचमी को हुई थी। पृथ्वीराज चौहान से सोलह बार पराजित होने के बाद मोहम्मद गोरी उन्हें सत्रहवीं बार छल से बंदी बनाकर अफगानिस्तान ले गया और वहां उनकी आंखें फोड़ दीं। गोरी ने मृत्युदंड देने से पहले पृथ्वीराज की निशानेबाजी का कमाल देखना चाहा। निशाना लगाते वक्त पृथ्वीराज के कवि मित्र चंदबरदाई ने कहा था –
चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण।
ता ऊपर सुल्तान है मत चूको चौहान।।
इस संकेत को सुनकर ही पृथ्वीराज ने जो तीर मारा , वह गोरी के मुंह में ही घुस गया। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने एक दूसरे के पेट में छूरा भोंक कर आत्म बलिदान दे दिया। ११९२ ई० की यह घटना बसंत पंचमी की है।
७. विद्वान राजा भोज का जन्म वसंतपंचमी को हुआ था। राजा भोज अपने जन्मोत्सव पर वसंत ऋतु में ४० दिवसीय राजकीय उत्सव का आयोजन कराते थे। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ” सरस्वती कण्ठाभरण ” में वसंत ऋतु में मनाए जानेवाले ‘सुवसन्तक’ एवं ‘वसन्तावतार’ नामक उत्सव का सुंदर वर्णन किया है।
८. वसंत पंचमी के दिन गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहिब में प्रयुक्त इकतीस शास्त्रीय रागों में से एक ” राग वसंत ” का मनोहारी कीर्तन किया जाता है , जो श्रद्धालुओं के मन में भक्ति और श्रद्धा भाव जागृत कर देता है।
९. वसंत पंचमी का संबंध बाल हकीकत राय के अनूठी बलिदान से भी है। लाहौर (अब पाकिस्तान) के मात्र आठ वर्ष के उस वीर बालक ने बलिदान दे दिया , पर अपना सनातन हिंदू धर्म नहीं त्यागा।
१०. गौ हत्या के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले गुरु राम सिंह कूका का जन्म वसंत पंचमी तिथि को लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था , जिसने अंग्रेजों की सत्ता की चूलें हिला दी थीं।
११. कविवर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘ निराला ‘ का जन्म वसंतपंचमी ( Basant Panchami 2025) को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में हुआ था , जिन्होंने अपनी काव्य-कृति ” वर दे ! वीणावादिनी वर दे” के माध्यम से मां शारदा की आराधना की थी।
१२. गायत्री परिवार के जनक युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का आध्यात्मिक जन्म – दिवस भी बसंत पंचमी ही है।
१३. भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना वसंतपंचमी के दिन ही की थी।
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थितां,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

अंत में शाला की वरिष्ठ शिक्षक शिक्षिकाओं के द्वारा बसंत पंचमी उत्सव ( Basant Panchami 2025) के बारे में विस्तार से सभी छात्र छात्राओं को अवगत कराया गया।इस उत्सव को लेकर बच्चो में काफी उत्साह दिखाई दिया ।स्व सहायता समूह के सदस्यों के द्वारा सभी को स्वादिष्ट खिचड़ी बनाकर खिलाया गया। कार्यक्रम में प्रधान पाठक जयंत सिंह क्षत्रिय समिति के अध्यक्ष तुरपाल सिंह, लव कुमार दुबे, बरसाती महराज सहित सदस्यगण , शिक्षक रजनीकांत धीवर शैलेंद्र कुंभकार, श्रीमती रमा प्रधान, धनेश राम वर्मा , श्रवण कुमार , भानू योगेंद्र राय तथा स्व सहायता समूह की अध्यक्ष श्रीमतीअंशु वर्मा उपस्थित थे।
