विशेष साक्षात्कार
बैंकों के निजीकरण के विरोध में देश भर में बैंककर्मियों के संगठन आंदोलन की राह पर हैं। अपने आंदोलन के समर्थन में पदयात्राएं करके लोगों का साथ मांग रहे हैं। कई मुद्दे और समस्याएं हैं।
कैंपस समाचार की टीम ने लखनऊ में बैंकों के निजीकरण से जुड़े कई अहम सवालों पर इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे कामरेड सौम्यादत्ता महासचिव आल इंडिया बैंक आफीसर्स कन्फेडेरशन से बातचीत की। पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश

प्रश्न : बैंकों के निजीकरण को लेकर केंद्र सरकार से क्या शिकायत है, किन नीतियों बैंक कर्मी परेशान हैं ?
उत्तर: अपने आप में यह बड़ा सवाल है कि बैंकों का निजीकरण क्यों ? आखिर केंद्र सरकार अचानक क्यों ऐसा करने का मन बना चुकी है। मेरा प्रश्न सरकार से है कि आखिर क्या कारण है कि केंद्र सरकार सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों का निजीकरण कर रही है। ऐसा करने के कारण सरकार देश के आम नागरिकों को बताए। मैं आपको थोड़ा पीछे की ओर ले कर चलता हूं , जब 1947 से 1969 के बीच में कुल 559 प्राइवेट बैंक फेल हो गए थे। 1948 से 1968 के बीच कुल 736 प्राइवेट बैंक्स पूरी तरह से फेल हुए। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पहले प्राइवेट बैंक मनमाने ब्याज दर पर लोगों को कर्ज देकर लोगों का शोषण करते थे। तब इंदिरा गांधी ने सोच समझ कर बैंकों का राष्ट्रीयकरण अधिनियम लाकर बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया ताकि लोगों को सस्ती बैंकिंग की सुविधा मिले जो देश के सभी नागरिक का अधिकार है कम ब्याज दर पर लघु उद्योग वाले को कर्ज मिले एससी, एसटी व ओबीसी वर्ग के लोगों को कम ब्याज दर पर लोन मिले ताकि उनका विकास हो और देश का विकास हो।

प्रश्न : सरकार किस तरह से बैंकों को बंद करने या निजीकरण का फैसला कर रही है?
उत्तर: देश का एक नागरिक होने के नाते यह हम लोगों का अधिकार है कि यदि कोई भी सरकार हो ऐसा जनविरोधी तथा देश विरोधी कानून लाती है, जिससे देश के आम आदमी का विकास रुक जाएगा तो हम उसका विरोध करेंगे अगर बैंकों का निजीकरण होगा तो पूंजी पतियों का एकाधिकार हो जाएगा देश धीरे-धीरे आर्थिक गुलामी की तरफ बढ़ जाएगा साधारण ग्राहकों के बैंकों में जमा राशि की सुरक्षा घटेगी
प्रश्न : निजीकरण से बैंककर्मियों के अलावा सामान्य लोगों को किस प्रकार की दिक्कतें आएंगी ?
उत्तर : आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग सस्ती बैंकिंग व्यवस्था से वंचित हो जाएंगे। क्या वरिष्ठ नागरिक जो सेवानिवृत्त हो गए हैं पूरे जीवन की जमा पूंजी प्राइवेट बैंक में रखना सुरक्षित रहेगा जहां आए दिन प्राइवेट बैंक फेल हो रहे हैं जैसे लक्ष्मी विलास बैंक ग्लोबल ग्लोबल ट्रस्ट बैंक आइएलएफएस डीएचएफएल इत्यादि बहुत सारे बैंक हैं और हाल में यस बैंक फेल हो गया उसको सरकारी बैंक एसबीआई ऑक्सीजन दे रहा है ? क्या आम आदमी के जीवन भर की जमा पूंजी वापस मिलेगी यदि प्राइवेट बैंक फेल हो जाता है क्या प्राइवेट बैंक की ब्रांच एस ग्रामीण क्षेत्रों में खुलेगी और सस्ती बैंकिंग सेवा प्रत्येक नागरिक को देगी क्या ? प्राइवेट बैंक प्रायरिटी सेक्टर लैंडिंग के टारगेट को पूरा कर पाएगी क्या प्राइवेट बैंक आम आदमी के लिए जनधन योजना के अंतर्गत खाता खुलेगी ? योजना सरकारी बैंक ने शत प्रतिशत से ज्यादा खोला है और प्राइवेट बैंक बहुत कम खोले हैं।
प्रश्न : सरकार की इन नीतियों से कितने बैंककर्मी प्रभावित हुए हैं या पूरी तरह से नौकरी छिन गई है?
उत्तर : आप सरकारी आंकड़ा इंटरनेट पर देख सकते हैं इन सभी को नीतियों से बैंक कर्मी परेशान हैं और बैंक कर्मी भारत को सरकारी बैंक निर्भर भारत बनाना चाहता है जहां पर प्रत्येक आदमी का विकास हो और देश का विकास हो ना कि कुछ गिने-चुने पूंजी पतियों का सरकार शीतकालीन सत्र में बैंकिंग कंपनी उपक्रमों कार्यक्रमों और हस्तांतरण अधिनियम उन्नीस सौ सत्तर और अस्सी तथा बैंकिंग विनियमन अधिनियम 1949 में संशोधन कर संशोधन कर बैंकों का निजीकरण का मन बना रही है । हम लोग इसका बैंक बचाओ देश बचाओ के माध्यम से विरोध करते हैं और हम इस विरोध में हम लोगों के साथ शत प्रतिशत ज्यादा कस्टमर साथ दे रहे हैं ।
प्रश्न : निजी बैंक तो पहले से हैं तो अब अगर बढ़ रहे हैं तो बैंक यूनियन को परेशानी क्यों हो रही है?
उत्तर : एआईबीओसी निजी बैंकों के राष्ट्रीयकरण की सिफारिश हमेशा से की है यह भी उसी हमेशा से सभी निजी बैंकों को राष्ट्रीय कृत करवाने के पक्ष में है वह यूनियन हमेशा निजी बैंकों के बढ़ावे पर आंदोलन किया है और इस बार बहुत जोर से विरोध कर रहा है और केंद्र सरकार को सुझाव दे रहा है कि सभी निजी बैंकों को राष्ट्रीयकृत बैंक कर दिया जाए ताकि देश के विकास में यह उत्प्रेरक का काम करें।
प्रश्न : बैंक बचाने के लिए चल रहे आंदोलन की क्या स्थिति है? आने वाले दिनों में इसका क्या स्वरूप होगा ?

उत्तर: हमने केंद्र सरकार से इस संबंध में पांच प्रश्न किए हैं एआईबीओसी चाहता है केंद्र सरकार इसका जवाब दें राष्ट्रीय कृत बैंकों को बचाने के लिए एआईबीओसी ने बैंक बचाओ देश बचाओ के माध्यम से एक आंदोलन शुरू किया है। हमारा यह बैंक बचाओ देश बचाओ आंदोलन की लड़ाई को हम लोकतांत्रिक संवैधानिक और अहिंसात्मक तरीके से लड़ रहे हैं हम लोग इस आंदोलन को सोशल मीडिया के माध्यम से बैंक बचाओ देश बचाओ फेसबुक पेज जिसमें 57000 लाइक हैं उस के माध्यम से लोगों में निजीकरण के दुष्परिणाम के बारे में लोगों को समझा रहे हैं अगर बैंक निजीकरण हो जाएगा तो देख फिर से आर्थिक रूप से कुछ कुछ पूंजी पतियों का गुलाम बन जाएगा आने वाले दिनों में यह एक विशेष विकराल रूप रूप लेगा जिसका असर आने वाले सभी चुनाव पर पड़ेगा हम बैंक कर्मी लोगों सभी ग्राहकों के घर घर जाएंगे तथा लोगों को निजी करण के दुष्प्रभाव के बारे में बताएंगे। १४ दिसंबर को दिल्ली में भी बैंकों के निजीकरण के खिलाफ प्रस्तावित आंदोलन का व्यापक समर्थन मिल रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी ने सौम्यदत्ता को पत्र लिखकर अपना पूर्णसमर्थन देते हुए कहा कि वे बैँको के निजीकरण की इस कोशिश के विरोध में हैं और बैंक आफीसर्स कन्फेडेशन की मांगों के साथ हैं।
