
- हिन्दी दिवस के अवसर पर विशेष :
- “हिन्दी सिर्फ भाषा नहीं, एक अभिव्यक्ति है”
लखनऊ,14 सितंबर . हिन्दी सिर्फ भाषा नहीं, एक अभिव्यक्ति है – हिन्दी का व्यक्तित्व वर्णमाला में काफी विशाल है। हिन्दी में ही वह सामर्थ्य है कि संसार की किसी भी बोली और भाषा को ज्यों का त्यों लिखित रूप दे सकती है। अब बात आती है कला साहित्य में लेखन की तो साहित्य में तो बहुत हिन्दी लेखन हुआ और हो भी रहा है। लेकिन कला के क्षेत्र में ख़ास तौर पर दृश्यकला में इसका विशेष अभाव रहा है। अमूमन साहित्यकार, कवि इस विधा में जो भी लेखन किया है वही रहा है कलाकारों की अपेक्षा साहित्यकार का योगदान ज्यादा रहा है। हालांकि आज कुछ कलाकार कला समीक्षक इस विधा में भी लेखन कार्य कर रहे हैं लेकिन कम है। हिंदी में कला पर पुस्तकें भी कम हैं अंग्रेजी की अपेक्षा।
भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने बताया कि आज हिन्दी दिवस के अवसर पर सप्रेम संस्थान और अस्थाना आर्ट फ़ोरम की तरफ से विषय – “कला लेखन और आम आदमी तक कला पहुंचाने में हिंदी का महत्व ” पर कुछ कलाकारों, लेखकों के विचार संग्रह करने की कोशिश की जो यहाँ प्रस्तुत किया गया है।
अखिलेश निगम ( वरिष्ठ कलाकार, कला आलोचक एवं इतिहासकार)- हिन्दी हमें आमजन तक पहुंचाती है।इसीलिए हिन्दी कला लेखन और संवाद कला को आमजन तक पहुंचाने में एक सीमा तक सहायक रहा है। वहीं कला विद्यार्थीयों ,अध्येताओं आदि के लिए भी कला इतिहास और समकालीन कला पर हिन्दी पुस्तकें महत्वपूर्ण रहती हैं।कला विकास के लिए हिन्दी एक उपयोगी भाषा है। हाँ, इस पर और गंभीर स्तर पर काम होना शुभकारी रहेगा।कलाकारों में एक भ्रम है कि अंग्रेजी भाषा के माध्यम से ही कला को पहचान मिल सकती है, पर ऐसा है नहीं ! अगर ऐसा है तब अध्ययन के लिए वे अंग्रेजी के बजाय हिन्दी भाषी पुस्तकों की तलाश में क्यों रहते हैं? शुरुआत घर (देश) से ही होती है। जहां आप अपनी भाषा से ही आमजन तक पहुंच बना सकते हैं। कला दीर्घाओं में दर्शकों का टोटा भी इससे कम हो सकता है।
वरिष्ठ समीक्षक नर्मदा प्रसाद उपाध्याय कहते हैं कि भारतीय कला की सबसे बड़ी विशिष्टता उसका साहित्य पर अवलंबित होना है।चाहे हमारे धार्मिक ग्रंथ हों जो साहित्यिक ग्रंथ ही हैं या हमारे गद्य और पद्य के साहित्यिक ग्रंथ , ये सभी हमारी कला के आधार हैं।हमारे यहां कृष्णलीला और राम लीला पत्थरों से लेकर कागज़ की भित्तियों पर उरेही और उकेरी गई और यह हुआ वाल्मीकि रामायण और भागवत से लेकर केशव के कवित्त, और बिहारी के दोहों से लेकर तमाम रीतिकालीन कवियों की रचनाओं के आधार पर। लेकिन इन पर v आधारित विशेषकर लघुचित्रों का विश्लेषण प्राय: अंग्रेज़ी में हुआ।हिंदी में कला इतिहास पर,इन कलात्मक उपादानों पर बहुत कम लिखा गया और इसके कारण सबसे बड़ी हानि यह हुई कि अंग्रेज़ी कलाविद इन अंकनों में निहित काव्य मर्म को नहीं समझ पाए और कुछ अपवादों को छोड़कर हमारे हिंदी के विद्वानों ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। इसलिए आज सर्वाधिक आवश्यकता कला लेखन हिंदी में करने की है ताकि हम हमारे कला शिल्प,स्थापत्य,और चित्रांकन के मर्म से साक्षात्कार कर सकें।
ग़ाज़ियाबाद से कला लेखक , समीक्षक वेद प्रकाश भारद्वाज कहते हैं कि कला में हिंदी का महत्व कला सम्बंधित लेखन से ही आंका जा सकता है। एक लंबे समय तक दैनिक समाचार पत्रों से लेकर दिनमान, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसे पत्रिकाओं ने हिंदी में कला लेखन को समृद्ध किया। पर अब इस तरह की पत्रिकाएं नहीं रहीं। दैनिक अखबारों में भी कला लेखन की जगह लगभग समाप्त ही है। क्षेत्रीय अखबारों में जरूर कला पर लेखन नजर आ जाता है। आज देखें तो हिंदी में कला लेखन की ज्यादा आवश्यकता है पर उसके लिए जगह कम है। हिंदी क्षेत्र में आधुनिक कला की समझ का विस्तार करने के लिए, सामान्य पाठकों में कला अभिरुचि जागृत करने के लिए हिंदी लेखन आवश्यक हो गया है। यह अच्छी बात है कि इधर हिंदी में कला पर कई पुस्तकें आई हैं। जहां तक कला पर हिंदी में लेखन के स्तर की बात है तो अभी इस दिशा में काफी काम किया जाना है। हिंदी में एक तरफ परिचयात्मक लेखन की आवश्यकता है तो दूसरी तरफ गहन आलोचनात्मक व वैचारिक लेखन भी आवश्यक है। इस दिशा में जबतक निजी कला दीर्घाएं पहल नहीं करेंगी, ठोस काम होने की संभावना कम है। ज्यादातर कलादीर्घाओं को हिंदी की जरूरत नहीं है क्योंकि उसके खरीददार की भाषा हिंदी नहीं है। प्रकाशकों में कला पुस्तकों को लेकर कोई विशेष उत्साह और समझ नहीं है।
लखनऊ से वरिष्ठ कलाकार जय कृष्ण अग्रवाल कहते हैं कि आज के कलाकार की रचना प्रक्रिया बौद्धिक जटिलताओं से परिपूर्ण है जिसके लिए प्रत्येक कलाकार को अपनी एक अलग आकारों और प्रतीकों की भाषा का सृजन करना आवश्यक होजाता है, अत: आधुनिक कला को आम आदमी तक पहुंचाने में बहुप्रचलित भाषा हिन्दी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
युवा चित्रकार फणीन्द्र नाथ चतुर्वेदी कहते हैं कि मुझे किसी भी दिवस मनाने से हमेशा ही परहेज़ होता है, क्योंकि इसमें एक तरह से हम मान लेते हैं कि जो कमज़ोर है उसे हम प्रोत्साहन के लिए एक दिन आरक्षित कर लेते हैं। और मुझे लगता है कि हिन्दी ना कभी कमज़ोर थी ना कभी हो सकती है, पर इतना जरूर है कि यदि हम अपना और अपनी कला और संस्कृति का सम्मान चाहते हैं तो हमें सामाजिक, राजनीतिक या सरकारी रूप से नहीं बल्कि दिल से अपनी भाषा को सम्मान देना होगा। ये भी एक कड़वा सच है की हिंदुस्तान में करीब ५३ करोड़ लोग हिन्दी लिखते, पड़ते और बोलते हैं पर हमें हिन्दी में दृश्य कला के ऊपर ना के बराबर पुस्तक मिलती हैं, जबकि हर प्रकार से ये एक बहुत बड़ा श्रोता, दर्शक या बाज़ार वर्ग है जिसकी हम लगातार उपेक्षा कर रहे हैं। मुझे लगता है हम अगर कला में खुद को समृद्ध करना चाहते हैं तो मौलिक रूप से हमें कला और कलाकार के ऊपर अधिक से अधिक मात्रा में और गुणवक्ता के साथ दस्तावेजीकरण करना ही होगा।
प्रसिद्ध रंगकर्मी ललित सिंह पोखरियाल कहते हैं कि कला और भाषा उद्देश्य की दृष्टि से सधर्मी हैं। दोनों का धर्म है अभिव्यक्ति और सम्प्रेषण। अभिव्यक्ति का ही अगला जुड़ा हुआ चरण होता है- सम्प्रेषण क्योंकि कभी-कभी हमारी अभिव्यक्ति में सम्प्रेषण की आवश्यकता सम्मिलित नहीं होती। इसे पाठक या दृष्टा की ग्रहण प्रवृत्ति पर छोड़ दिया जाता है। लेकिन कभी-कभी रचनाकार का अपना एक रचनात्मक आग्रह भी होता है कि उसे यही बात प्रेक्षक, पाठक या श्रोता तक पहुँचानी है। अगर हम भारत के हिन्दी भाषा भाषी क्षेत्र की बात करें तो हिन्दी लगभग १५० वर्षों से सर्वग्राही भाषा रही है। और भारतीय चित्रकला में भी इसी कालखण्ड में राजा रवि वर्मा के यथार्थवाद के बाद अलग-अलग वादों में सर्जना हुई है। मैं यह बात निःसंकोच कह सकता हूँ चित्रकला के मैंने जो जो भी आयाम देखे, उनसे जो संवेदना , जो विचार मैंने ग्रहण किये हैं वे हिन्दी में ही मेरे मन-मस्तिष्क तक पहुँचे हैं। मुझे लगता है कि उत्तर भारतीय चित्रकला के रंगों की, रंगों की तीव्रता और छाया की जो भाषा है, जो सम्वेदना है उसमें तथा हिन्दी भाषा के चरित्र और सम्वेदना में बहुत बड़ी समानता है।
नई दिल्ली से सुमन कुमार सिंह कलाकार/ कला लेखक कहते हैं कि कला की दुनिया में हिंदी के प्रयोग की बात करें तो हम जानते हैं कि भारतीय भाषाओं में हमारे यहां कला एवं शिल्प पर दर्जनों महत्वपूर्ण ग्रंथ रचे गए हैं। वहीं बहुत सारी पुस्तकों का संस्कृत से हिंदी में अनुवाद भी किया गया है। विष्णुधर्मोत्तरपुराण का चित्रसूत्र इसका एक उदाहरण भर है। बीसवीं सदी की बात करें तो बासुदेव शरण अग्रवाल, वाचस्पति गैरोला, राय कृष्ण दास जैसे अनेक विद्वानों ने हिंदी में कला विषयक पुस्तकें लिखी हैं। आधुनिक कला की चर्चा करें तो प्रयाग शुक्ल, विनोद भारद्वाज जैसे कई नाम हमारे सामने हैं। जो मौजूदा समय में भी निरंतर सक्रिय हैं। इसी कड़ी में हम अशोक भौमिक, अवधेश अमन, भुनेश्वर भास्कर, विनय कुमार, ज्योतिष जोशी जैसे दर्जनों नाम ले सकते हैं। मेरी समझ से हिंदी में कला लेखन करनेवालों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है, तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद।
लेकिन इन सबके बावजूद एक तथ्य यह भी है कि आज अधिकतर कलाकार और कला दीर्घाएं अंग्रेजी को प्राथमिकता देते हैं। इसके पीछे अक्सर उनका तर्क होता है कि धनाढ्य वर्ग हिंदी के बजाए अंग्रेजी का प्रयोग ज्यादा करते हैं। और कलाकृतियों के खरीदार चूंकि उसी वर्ग से आते हैं,इसलिए प्रदर्शनियों के कैटलॉग ज्यादातर अंग्रेजी में ही तैयार किए जाते हैं। ऐसे में देखा जाता है कि उन दीर्घाओं या कलाकारों की मांग पर हिंदी के लेखक भी या तो अंग्रेजी में लिखने को मजबूर हो जाते हैं, या अपने लेख का अंग्रेजी अनुवाद करवाते हैं। ऐसे में इतना तो स्पष्ट है कि कला लेखन के क्षेत्र में अंग्रेजी को वरीयता मिलती ही रहेगी।
कला एवं शिल्प महाविद्यालय लखनऊ के पूर्व प्रधानाचार्य आलोक कुशवाहा कहते हैं कि मेरे लिए हिंदी का अर्थ है ….मातृभाषा; कला में किसी भी भाषा का कोई महत्व नहीं है ….कला स्वयं में ही एक गुढ एव सबसे अधिक प्रभावशाली भाषा है …परंतु कला की चर्चा के लिए हिंदी उत्तर भारत में एक उपयुक्त माध्यम है. अगर हमें कला चर्चा को आम लोगों तक पहुंचाना है तो उसकी संप्रेषणयत्ता को बढ़ाना होगा. इसे आम भाषा अर्थात हिंदी में ही होना पड़ेगा .हमारे सामने उदाहरण है… गौतम बुद्ध ;महावीर तथा अनेक ऐसे विचारक जिन्होंने अपने विचारों के द्वारा समाज में एक क्रांति पैदा की.. उन्होंने आम जन की भाषा को ही चुना. ऐसा ही आचार्य तुलसी दास , संत कबीर आदि ने भी किया जिसके कारण उनकी रचनाएं और विचार लोगों तक पहुंचे. आज उत्तर भारत में हिंदी क्षेत्रों में गंभीर कला चिंतन का सर्वथा अभाव है. जरूरत इस बात की है कि यह कला चिंतन आम भाषा में सरलतम रूप में लोगों तक पहुंचे. अधिक से अधिक लोग इससे जुड़े .इसके लिए जो सबसे प्रभावशाली भाषा हो सकती है वह हिंदी ही है. मेरी अपेक्षा है कि तमाम पत्र-पत्रिकाओं में अंग्रेजी की भांति ही गंभीर लेखन हिंदी में भी उपस्थित हो तभी हिंदी की स्तरीयता बढ़ेगी .लोगों को उपयुक्त साधन, सामग्री ,विचार और चिंतन प्राप्त होगा .नई विधाओं और विचारों से जागरूक करने हेतु हिंदी को अधिक से अधिक बलवान तथा उसका बहुत अधिक विस्तार करने की जरूरत है।
नई दिल्ली से चित्रकार व कला समीक्षक रविन्द्र दास कहते हैं कि हालांकि हम सब जानते हैं आधुनिक कला मात्र अंग्रेजी भाषी अभिजात्य वर्ग का ही शौक रहा है फिर भी हिंदी दिवस पर हिंदी भाषी कलाकारों का ये सपना तो होता ही है काश देशी और विदेशी कला की पुस्तकें हिंदी में भी उपलब्ध होती और गैलरीयों के कैटलाग हिंदी में होते । कम से कम बड़े भारतीय कलाकार हिंदी में बात करने में शर्म तो न महसूस करें । कला की दुनिया एलीट क्लास की दुनिया है यह जानते हुए भी ज्यादातर हिंदी भाषी क्षेत्रों के कलाकार ही संघर्षरत हैं यह भी सच्चाई है। हिंदी में कला विषय पर लिखते समय लेखकों को कुछ कठिनाई तो होती है पर इन्हीं आलेखों से आम आदमी में कला के प्रति रुचि बढ़ी है ।
ग़ाज़ियाबाद से ही चित्रकार व कला समीक्षक जय प्रकाश त्रिपाठी कहते हैं कि कला के क्षेत्र में हिंदी लगातार बढ़ रही है। हिंदी से कला जगत निरंतर तरक्की कर रहा है हिंदी के अखबार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी हर तरह से , चाहे वह हिंदी सिनेमा हो , दृश्य कला या कला के अन्य माध्यम , लोकप्रियता के नए मानदंड स्थापित कर रहा है विज्ञापन जगत की कला में हिंदी की धूम है।
कलाकार के हालात पहले से संतोषजनक है। कला के क्षेत्र में हिंदी को सक्षम और उपयोगी बनाने काम निश्चित रूप से कलाविदों, समीक्षकों और कला से जुड़े लोगों का है। आज वास्तविकता यह है की हिन्दी में कलाकारों की कला पढने की दिलचस्प अधिक होती है।आज हिंदी दिवस है और वास्तविक रूप में राष्ट्र भाषा राजभाषा बनने की ओर अग्रसर है,जिसके प्रचार प्रसार में कला का महत्वपूर्ण योगदान है।
मूर्तिकार राजेश कुमार कहते हैं कि आजादी के 75 वर्षों के बाद भी और 14 सितंबर,1949 में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिए जाने के निर्णय के बाद 1953 से अनवरत हिंदी के प्रचार प्रसार व उत्थान के उद्देश्य से हिंदी पखवाड़ एक राष्ट्रीय पर्व की भांति हम मनाते आ रहे हैं। किन्तु इस उद्देश्य की पूर्ति व सफलता हम कला, साहित्य, पत्रकारिता,शिक्षण संस्थान व प्रकाशन के साथ साथ सामान्य व्यवहार में भी कमतर देख पाते हैं। कला लेखन और प्रकाशन की बात करें तो आज भी हम एक रिक्तता ही पाते हैं, जबकि जन जन तक कला तत्व को पहुंचाने में हिंदी का विशेष महत्व है। हिंदी भाषा में जो माधुर्य, लालित्य और शब्दों का संसार है,इसे समृद्ध बनाती है, फिर हम क्यों हिंदी के साथ खड़े नहीं हो पाते! चिंता का विषय है।
आंग्ल भाषा के प्रयोग को कला जगत में कला व कलाकार की श्रेष्ठता का मानक मान लेना हिंदी की अवहेलना के साथ साथ कला को सीमित करना ही होगा। कला लेखन में हिंदी का महत्व निःसंदेह कला जगत के लिए विस्तारवादी सिद्ध होगा।
गिरीश पाण्डेय कहते हैं कि कला भाव की अभिव्यक्ति है और कला स्वयं एक भाषा है। ये तो सभी जानते हैं। कला अभिव्यक्ति के कई माध्यम हैं इसकी अभिव्यक्ति रंग, रेखा, ध्वनि, शब्द, अंग संचालन (अभिनय) के द्वारा की जाती है। कला भाव की अभिव्यक्ति होती है। कला अभिव्यक्ति के लिए शब्द एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। भाषा भी ध्वनि से शब्द रूप में भाव को ही अभिव्यक्त करने का माध्यम हैं। विश्व मे आनेक भाषाएँ हैं। शब्द किसी भाषा के मूल होते हैं परंतु हिन्दी एक ऐसी भाषा है, जिसमें संकेत, भाव, एवं ध्वनि के लिए भी वर्ण और अक्षर हैं। विश्व मे यदि सबसे समृद्ध कोई भाषा है, तो वह हिन्दी ही है। कहते हैं की ब्रह्मांड ध्वनि ॐ के उच्चारण जैसा है। ‘शब्द ब्रह्म’ जैसे शब्द भारत भूमि पर और हिन्दी भाषा मे ही सुनने को मिलते हैं। अतः मेरा यह मानना है की कला को समझने और समझाने के लिए हिन्दी से उपयुक्त कोई भाषा नहीं हो सकती।
