
*”उर्दू और हिंदुस्तान की गंगा जमुनी तहज़ीब”
भारत सांस्कृतिक، धार्मिक और भाषाई विविधता एवं समरसता का देश है। यहाँ हज़ारों किस्म की जबानें और बोलियां प्रचलित हैं। हमारी परंपराओं में विभिन्न प्रकार के धर्म-संप्रदाय, रंग-नस्ल, रीति-रिवाज, वेश-भूषा और आहार-व्यवहार शामिल हैं। सभी की अपनी अपनी प्रासंगिकता और मान्यताएं हैं। उन तमाम विविधताओं से मिल कर ही हिन्दुस्तान बनता है और यही खूबियां इस देश को महान बनाती हैं। अनेकता में एकता की ये खूबसूरत मिसाल दुनिया में कहीं और नहीं मिलती। दर असल हमारा मुल्क एक ऐसे खूबसूरत चमन की मानिंद है, जिस में रंग-रंग और भांति भांति के फूल खिले हों। किसी शायर ने क्या खूब कहा है:
चमन में इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू से बात बनती है
हम ही हम हैं तो क्या हम हैं तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो
भाषाएं और बोलियां अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम होती हैं। भाषाएं सामाजिक रिश्तों का ताना-बाना भी तैयार करती हैं। भाषा और साहित्य के बग़ैर एक आदर्श समाज की कल्पना संभव नहीं। ज़बान का कोई मज़हब नहीं होता। ज़बान के पैदा होने और फलने-फूलने की एक लंबी दास्तान होती है। इंसानों की तरह ज़बानों के भी खानदान होते हैं। भाषाविदों के मुताबिक भाषाएं और बोलियां इंसानों की तरह पैदा होती हैं और अपनी उम्र गुज़ार कर शिथिलता का शिकार भी होती हैं। उर्दू एक बेहद लोकप्रिय भाषा रही है। कभी उर्दू को हिंदी, हिंदवी और रेख़्ता के नाम से भी जाना पहचाना गया। इन नामों से भी उर्दू की भाषाई और सांस्कृतिक उदारता प्रकट होती है। इसे चाहने वालों की संख्या में हर रोज़ इज़ाफ़ा हो रहा है। एक आंकड़े के मुताबिक पूरी दुनियां में तक़रीबन 230 मिलियन लोग उर्दू बोलते हैं। इस ज़बान का जन्म हिंदुस्तान की मिट्टी में हुआ। इस की पैदाइश की कहानी 12 वीं शताब्दी में उत्तर पश्चिमी भारत के क्षेत्रीय अपभ्रंश से शुरू होती है। उर्दू ज़बान के पास इस मिट्टी की सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक धरोहर की एक शानदार विरासत मौजूद है।
देश की सांस्कृतिक विविधता के संदर्भ में ज़बानों का आपसी रिश्ता क़ाबिल-ए-ग़ौर है। भाषाएं और बोलियां अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर का आईना भी होती हैं। सांस्कृतिक समरसता की बुनियाद पर उर्दू को हिंदी की सगी बहन कहा गया है। उपर्युक्त दोनों भाषाएं एक दूसरे के बग़ैर अधूरी हैं। दोनों में ग़ज़ब की समानताएं हैं। लिपी से इतर दोनों का व्याकरणिक संरचना काफी समान है। खड़ी बोली से दोनों का गहरा नाता है। दुनियां की किसी भी दो ज़बानों में इतनी समानताएं नहीं मिलतीं। मुनव्वर राणा का शेर है “सगी बहनों का जो रिश्ता है उर्दू और हिन्दी में/कहीं दुनिया की दो ज़िंदा ज़बानों में नहीं मिलता” उर्दू और हिंदी का भाषाई संबंध सांझी विरासत की खूबसूरत मिसाल है। जहां एक तरफ़ ग़ैर मुस्लिम रचनाकारों ने उर्दू भाषा और साहित्य की उत्कृष्ट सेवा की वहीं दूसरी तरफ अमीर खुसरो, अब्दुर्रहीम खानखाना, मलिक मोहम्मद जायसी, रसखान, राही मासूम रजा, मंजूर एहतेशाम और अब्दुल बिस्मिल्ला जैसे मुस्लिम साहित्यकारों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। उर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं का संस्कृत से गहरा संबंध है। उपर्युक्त दोनों जबानें इंडो-आर्यन भाषा परिवार से हैं। अर्थात संस्कृत से प्राकृत भाषाएँ वजूद में आईं और फिर उनसे उर्दू और हिंदी जैसी आधुनिक जबानें पैदा हुईं। दर असल संस्कृत एक ऐसी प्राचीन ज़बान है, जिस ने मुख्तलिफ इंडो-आर्यन भाषाओं को प्रभावित किया। इसी लिए संस्कृत को भाषाओं की जननी कहा गया है। उर्दू फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है लेकिन उत्पत्ति, व्याकरण और शब्दावली के दृष्टिकोण से इस का रिश्ता संस्कृत और दूसरी भारतीय भाषाओं से जुड़ता है। उर्दू में प्रचलित संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, कहावतों और और मुहावरों का अधिकांश हिस्सा संस्कृत और हिंदी से लिए गए हैं। भाषाविदों के अनुसार उर्दू ने अवधि, हरियाणवी, बुन्देली, कन्नौजी, पंजाबी, बंगाली जैसी क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों का असर भी कुबूल किया। ऊर्दू की ये विशेषताएं उस की भाषाई समरसता को दर्शाती हैं।
उर्दू अमन और मुहब्बत की ज़बान है। उर्दू रिश्तों की तुरपाई करती है। रिश्तों में मिठास घोलती है। बशीर बद्र ने क्या खूब कहा है “सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें/आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत” मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने कहा था “अगर आप उर्दू सीखना चाहते हैं तो इश्क़ कर लीजिए और अगर इश्क़ करना चाहते हैं तो उर्दू सीख लीजिए” मीर, ग़ालिब और फिराक ने अपनी ग़ज़लों में इश्क़ के मुख्तलिफ रंग-ओ-रूप को कलात्मक अंदाज में चित्रित किया है। उन की रचनाओं में माशूक के हुस्न-ओ -जमाल के साथ साथ रूह में उतर जाने की आरज़ू भी है। इश्क़-ओ-मुहब्बत के साथ साथ उर्दू इंकलाब और कुर्बानी का संदेश भी देती है। पंडित ब्रज नारायण चकबस्त, फैज़, जोश और इक़बाल की नज़्मों में वतन परस्ती का जज़्बा कूट कूट कर भरा है। चकबस्त की नज़्म “ख़ाक-ए-हिन्द” में मुल्क के प्रति बेपनाह मुहब्बत और कुर्बानी का पैग़ाम देती है। इस नज़्म के हर हर लफ्ज़ से मुल्क की विराटता और भव्यता की ख़ुशबू आती है। “ऎ ख़ाक-ए-हिन्द तेरी अज़मत में क्या गुमाँ है/दरिया-ए-फ़ैज़-ए-क़ुदरत तेरे लिए रवाँ है” इक़बाल की नज़्म “तराना-ए-हिन्दी” (सारे जहाँ से अच्छा) देशभक्ति की उम्दा मिसाल है। ये नज़्म हिंदुस्तान की अज़मत को भावपूर्ण अंदाज में पेश करती है। उन एक दूसरी नज़्म “नया शिवाला” प्रस्तुत हैं:
सच कह दूँ ऐ बरहमन गर तू बुरा न माने
तेरे सनम-कदों के बुत हो गए पुराने
अपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखा
जंग-ओ-जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा ने
तंग आ के मैं ने आख़िर दैर ओ हरम को छोड़ा
वाइज़ का वाज़ छोड़ा छोड़े तेरे फ़साने
पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है
ख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है
आ ग़ैरियत के पर्दे इक बार फिर उठा दें
बिछड़ों को फिर मिला दें नक़्श-ए-दुई मिटा दें
सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती
आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें
दुनिया के तीरथों से ऊँचा हो अपना तीरथ
दामान-ए-आसमाँ से इस का कलस मिला दें
हर सुब्ह उठ के गाएँ मंतर वो मीठे मीठे
सारे पुजारियों को मय पीत की पिला दें
शक्ति भी शांति भी भगतों के गीत में है
धरती के वासीयों की मुक्ती प्रीत में है
नज़्म की पंक्ति “ख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है” मुल्क की मिट्टी के प्रति गहरा प्रेम एवं सम्मान व्यक्त करती है। इस रचना में इक़बाल ने मज़हबी तंग-नज़री पर चोट की है। वो एक ऐसा शिवाला बनाना चाहते हैं, जहां प्रेम और शांति की गंगा बहती हो। उन की एक दूसरी नज़्म “हिमाला” हिंदुस्तान की खूबसूरती के विभिन्न आयाम को काव्यगत सौंदर्य के साथ पेश करती है। नज़्म की प्रारंभिक पंक्ति “चूमता है तेरी पेशानी को झुक कर आसमाँ” हमारे दिल में फख्र का एहसास पैदा करता है। देशभक्ति में डूबी हुई उर्दू की बेशुमार ऐसी काव्यगत रचनाएं हैं, जिन में देश के लिए श्रद्धा एवं अक़ीदत का जज़्बा झलकता है।
उर्दू ने आज़ादी की लड़ाई में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। “इंकलाब ज़िंदाबाद” का नारा ब्रिटिश सरकार की तानाशाही और ज़ुल्म व अत्याचार के खिलाफ़ हथियार के तौर पर इस्तेमाल हुआ। शायरों फिक्शन निगारों और उर्दू पत्रकारों ने अंग्रेज़ों की दमनकारी शक्तियों के खिलाफ़ बगावत की आवाज़ बुलंद की। स्वतंत्रता संग्राम के पहले पत्रकार मौलवी मुहम्मद बाकर(1780-1857) को ब्रिटिश सरकार ने विद्रोह के जुर्म में तोप से उड़ा दिया था। हसरत मोहानी, मुहम्मद अली जौहर और मौलाना आज़ाद जैसे उर्दू पत्रकारों ने ज़ुल्म सहते हुए भी जंग-ए-आजादी को लौ को कभी बुझने ना दिया। संपूर्ण आज़ादी की मांग उठाने वाले स्वतंत्रता सेनानी मौलाना हसरत मोहानी ने ही “इंकलाब ज़िंदाबाद” का नारा दिया था। उन्होंने ने अपनी पत्रिका “उर्दू-ए-मुअल्ला” और शायरी के माध्यम से आज़ादी के आंदोलन को गति प्रदान की। पत्रकारिता और शायरी से इतर उर्दू फिक्शन ने भी आजादी की लड़ाई में अविस्मरणीय भूमिका अदा की है। प्रेमचंद, कृष्ण चन्द्र, सआदत हसन मंटो, अली अब्बास हुसैनी, इस्मत चुग़ताई और राजेंद्र सिंह बेदी जैसे प्रख्यात कथाकारों ने स्वाधीनता की लड़ाई को आगे बढ़ाया। उर्दू कहानियों और उपन्यासों में आज़ादी की लड़ाई महत्वपूर्ण विषय रहा है। उर्दू कथाकारों ने जन भावनाओं, संघर्षों और स्वतंत्रता आंदोलन का जीवंत चित्रण किया है। उन साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के ज़रिए ब्रिटिश सरकार की हर तरह की साजिशों को बेनक़ाब किया है। प्रेमचंद का कहानी संग्रह सोज़-ए-वतन(1905) अंग्रेजों ने ज़ब्त कर लिया था। मंटो की कहानी “नया क़ानून” में अंग्रेज़ों के प्रति नफ़रत और गुस्सा को व्यक्त किया गया है।
उर्दू शायरों ने भी अपनी कृतियों के द्वारा आज़ादी के मतवालों का लहू गर्म किया। बिस्मिल की मशहूर ग़ज़ल “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है/देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है” आज भी हमारे सीने में देश पर मर मिटने का जज़्बा पैदा करती है। उर्दू शायरी ख़ास तौर पर ग़ज़लों और नज़्मों में वतन परस्ती के जज़्बात और देश भक्ति की भावना को बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में व्यक्त किया गया है। शायरों ने अपने कलाम में वतन की मिट्टी के प्रति प्रेम, निष्ठा, श्रद्धा और समर्पण की भावना को सुंदरता से पेश किया है। वतन परस्ती पर आधारित चंद शेर पेश-ए-ख़िदमत हैं।
कितना है बद-नसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
बहादुर शाह ज़फ़र
हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़
गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सही
साहिर लुधियानवी
दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त
मेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगी
लाल चंद फ़लक
वतन की रेत ज़रा एड़ियाँ रगड़ने दे
मुझे यक़ीं है कि पानी यहीं से निकलेगा
मुज़फ़्फ़र वारसी
लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है
उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी
फ़िराक़ गोरखपुरी
वतन की पासबानी जान-ओ-ईमाँ से भी अफ़ज़ल है
मैं अपने मुल्क की ख़ातिर कफ़न भी साथ रखता हूँ
अज्ञात
दुनियां की हर ज़बान अपने मुल्क की ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक और धार्मिक सभ्यता एवं संस्कृति को प्रमुखता से व्यक्त करती है। उर्दू हिंदुस्तान की एक ऐसी लोकप्रिय ज़बान है, जो अपनी मिट्टी की ख़ुशबू और मुल्क की तहज़ीबी रंगारंगी को खुद में समेटे हुए है। 18 वीं सदी के जनकवि नज़ीर अकबराबादी की कृतियां हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब, सामाजिक जीवन, मेले ठेले और यहां की दूसरी सांस्कृतिक विविधता का जीवंत चित्रण प्रस्तुत करती हैं। उर्दू रचनाओं में अगर ईद और शब-ए-बारात की खुशियां नज़र आती हैं तो होली एवं दीवाली का उल्लास भी मौजूद है। हैदर बयाबानी, जोश मलीहाबादी, कैफ़ी आज़मी और नज़ीर बनारसी, निदा फ़ाज़ली और जावेद अख्तर वगैरह की कृतियों में हिंदू तीज त्योहारों का भावपूर्ण वर्णन मिलता है। नज़ीर अकबराबादी की नज़्म “दीवाली” की चार पंक्तियां पेश-ए-खिदमत हैं:
हर इक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का
हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का
सभी के दिल में समाँ भा गया दिवाली का
किसी के दिल को मज़ा ख़ुश लगा दिवाली का
उर्दू भाषा और साहित्य को सींचने और संवारने में विभिन्न मज़हब/संप्रदाय के अदीबों और साहित्यकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। अफ़सोस कि उर्दू को एक ख़ास मज़हबी तबके से नत्थी किया जाता है। जबकि उर्दू सभी को गले लगाती है। उर्दू साहित्य का पहला इतिहास राम बाबू सक्सेना ने लिखा। उर्दू की पहली ग़ज़ल चंद्रभान ब्राह्मण ने रची। अमीर खुसरो से लेकर मुंशी प्रेमचंद तक बहुत से क़लम कारों ने इस साझी विरासत को समृद्ध किया। इंशा अल्ला खां इंशा की उत्कृष्ट रचना “रानी केतकी की कहानी” उस साझी विरासत की महत्वपूर्ण कड़ी है। ऊर्दू कथा साहित्य को गति देने में मुंशी प्रेमचंद, कृष्ण चंद्र, रामानंद सागर, उपेन्द्र नाथ अश्क, राजेंद्र सिंह बेदी, जोगेंद्र पाल, सुरेन्द्र प्रकाश, रतन सिंह जैसे नामचीन गैर मुस्लिम रचनाकारों ने अहम भूमिका निभाई। उर्दू शायरी की दुनियां में पंडित दयाशंकर नसीम, पंडित बृज नारायण चकबस्त, जगन नाथ आज़ाद, त्रिलोक चंद महरूम, फ़िराक़ गोरखपुरी और कुंवर महेंद्र सिंह बेदी, आनंद मोहन जुत्शी गुलज़ार देहलवी वगैरह का नाम सम्मान से लिया जाता है। पंडित दयाशंकर नसीम(1811–1845) का शुमार लखनऊ के प्रमुख शायरों में होता है। उन की मसनवी(महाकाव्य) “गुलज़ार-ए-नसीम” के बग़ैर उर्दू साहित्य का इतिहास अधूरा है। ये महाकाव्य लखनऊ स्कूल ऑफ थॉट की प्रतिनिधि रचना है। अनूठी शैली में रचित अश्किया मसनवी “गुलज़ार-ए-नसीम” तमाम विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम का हिस्सा है। इस महाकाव्य के बारे चकबस्त ने लिखा है कि “पंडित दयाशंकर नसीम ने मसनवी की शक्ल में मोती पिरोए हैं” इस ज़बान के कंपोजिट कल्चर को समृद्ध करने वाले सभी ग़ैर मुस्लिम-क़लम कारों पर ऊर्दू को हमेशा नाज़ रहेगा।
उर्दू की ऐतिहासिक पत्रिका “ज़माना” के संपादक दयानारायण निगम (1882 -1942) का योगदान उर्दू साहित्य के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। उन्होंने ने मासिक पत्रिका “ज़माना” के माध्यम से उर्दू भाषा और साहित्य की अभूतपूर्व सेवा की। प्रेमचंद की पहली कहानी “‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन” और अल्लामा इक़बाल की सुप्रसिद्ध नज़्म “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा” पहली बार इसी मैगज़ीन में प्रकाशित हुई थी। नवाबराय के नाम से लिखने वाले धनपतराय को प्रेमचन्द का नाम दयानारायण निगम ने दिया था। उर्दू की साझी विरासत के संदर्भ में मुंशी नवल किशोर(1836-1895) को नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता। मुंशी नवल किशोर का जन्म एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उर्दू भाषा और साहित्य पर उन के बड़े उपकार हैं। उन्होंने ने अपने नाम से प्रिंटिंग प्रेस स्थापित किया। उत्तर भारत का पहला उर्दू समाचार पत्र “अवध अख़बार” नवल किशोर प्रेस से ही शुरू हुआ। मिर्ज़ा ग़ालिब जैसे महान शायर की रचनाएं और कृतियां इसी प्रेस से प्रकाशित हुईं। मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपने एक खत में लिखा है “इस प्रेस ने जिसका भी दीवान(संग्रह) छापा, उसको ज़मीन से आसमान तक पहुंचा दिया” नवल किशोर प्रेस से उर्दू के अलावा अंग्रेजी, हिंदी संस्कृत, अरबी, फ़ारसी, मराठी, बंगाली और गुरुमुखी आदि भाषाओं की हज़ारों किताबें प्रकाशित हुईं। इस अवसर पर उर्दू, अरबी और फारसी के प्रचंड विद्वान मालिक राम (1906-1993) का जिक्र भी लाज़मी है। उन की महत्वपूर्ण किताब “तज़किरा-ए-मुआसरीन” के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन का शुमार ग़ालिब के चुनिंदा आलोचकों और विशेषज्ञों में होता है। उन्होंने ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा अपने पसंदीदा शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के अध्ययन में लगाया। ग़ालिब के हवाले से उन की किताब “ज़िक्र-ए-गालिब” “फसाना-ए-ग़ालिब” और “तलामिज़ा-ए-ग़ालिब” को आज भी आधिकारिक हैसियत हासिल है। मालिक राम ने मिर्ज़ा ग़ालिब की उर्दू व फ़ारसी कृतियों “दीवान-ए-ग़ालिब” “सब्द-ए-चिन” “गुल-ए-राना” और “ख़ुतूत-ए-ग़ालिब” का संपादन भी किया।
उर्दू ज़बान-ओ-अदब की परंपरा को आगे बढ़ाने में मौलवी महेश प्रसाद और हुक्म चंद नय्यर का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उर्दू शोध और आलोचना के क्षेत्र में उपर्युक्त दोनों विद्वानों का ख़ास किरदार रहा है। मौलवी महेश प्रसाद और हुक्म चंद नय्यर का संबंध उर्दू विभाग, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से था। मौलवी महेश प्रसाद का शुमार उर्दू, फारसी और अरबी के नामवर स्कॉलर में होता है। भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय की दूरदर्शिता के परिणामस्वरूप 1917 में उर्दू फ़ारसी और अरबी का संयुक्त विभाग क़ायम हुआ। मदन मोहन मालवीय के पारदर्शी विचार के अनुसार मौलवी महेश प्रसाद इन तीनों विभागों के अध्यक्ष नियुक्त किए गए। उन्होंने उर्दू भाषा और उस के कंपोजिट कल्चर को फलने फूलने में आधारभूत योगदान दिया। “मेरी ईरान यात्रा” “अरबी काव्य दर्शन” “ख़ुतूत-ए-ग़ालिब” और “रूबाईयात-ए-उमर खय्याम” उन की प्रसिद्ध किताबें हैं। मौलवी महेश प्रसाद का बड़ा साहित्यिक कारनामा “ख़ुतूत-ए-ग़ालिब” का संपादन और प्रकाशन है। 1974 में उर्दू, अरबी और फ़ारसी का विभाग अलग हो गए। 1974 से लेकर 1991 तक उर्दू विभाग की बागडोर हुक्म चंद नय्यर ने संभाली। “सुरूर जहानाबाद” “मज़ामीन-ए-चकबस्त” “इब्तिदाई उर्दू” “उर्दू के मसाएल” “नवाए ग़ालिब” “इंतखाब-ए-मरासी” “इंतखाब-ए-नस्र” उन की महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। उन की संकलित और संपादित कई किताबें आज भी विभिन्न विश्वविद्यालयों की पाठ्यक्रम के हिस्सा हैं। उन दोनों साहित्यकारों और विद्वानों के साहित्यिक कारनामों पर आधारित कई किताबें, मोनोग्राफ और पत्र-पत्रिकाओं में विशेषांक प्रकाशित हुए।
उर्दू ज़बान में वेद, रामायण, महाभारत और गीता की दर्जनों अनुवादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वेद हिंदू धर्म का प्राचीनतम साहित्य माना जाता है। उर्दू में वेद के कई अनुवाद उपलब्ध हैं। उर्दू के बड़े शायर अनवर जलालपुरी ने गीता का तर्जुमा उर्दू शायरी में किया है। चकबस्त ने रामायण जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक महाकाव्य को उर्दू का लिबास पहनाया। अखिल भारतीय संस्कृत संस्थान, दिल्ली ने रामायण, महाभारत और गीता के उर्दू अनुवाद प्रकाशित किए हैं, जिसके फलस्वरूप उन धार्मिक ग्रंथों में वर्णित जीवन दर्शन उर्दू भाषी लोगों तक सुगमता से पहुंच सका। उर्दू का ये समावेशी मिज़ाज उसे समरसता और विविधता प्रदान करता है। उर्दू साहित्य में हिंदी देवी-देवताओं और सूफ़ी-संतों का श्रद्धापूर्वक उल्लेख किया गया है। उर्दू शायरी में कृष्ण-भक्ति का खूबसूरत अक्स उभरता है। शायरों ने कृष्ण के मुख्तलिफ रूप को पेश किया है। प्रगतिशील शायर हसरत मोहानी को कृष्ण से खास अक़ीदत थी। जन्माष्टमी के अवसर पर हसरत मोहानी अक़ीदत के साथ मथुरा हाज़िरी देते थे। उन का शेर है: हसरत की भी क़बूल हो मथुरा में हाज़िरी/सुनते हैं आशिकों पे तुम्हारा करम है ख़ास। श्री रामचन्द्र के जीवन, आदर्श और उन की भक्ति पर आधारित उर्दू में कई नज़्में लिखी गई हैं। इक़बाल ने अपनी सुप्रसिद्ध नज़्म “राम” में मर्यादा पुरुषोत्तम की अज़मत पर रोशनी डालते हुए लिखा है:
इस देश में हुए हैं हज़ारों मलक सरिश्त
मशहूर जिन के दम से है दुनिया में नाम-ए-हिंद
है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़
अहल-ए-नज़र समझते हैं उन्हें इमाम-ए-हिन्द
भारत की सांस्कृतिक परंपरा के प्रति उर्दू का रवैया बेहद भावपूर्ण रहा है। अपने प्रगतिशील विचार एवं विमर्श के आधार पर उर्दू ने सदैव मानवता, भाईचारा और सौहार्द्र जैसे मानवीय मूल्यों की हिमायत की है। उर्दू साहित्य ने सभी सामाजिक और धार्मिक तबकों के प्रति उदारता का परिचय दिया है। शायरों और अदीबों ने सांप्रदायिक और धार्मिक संकीर्णता एवं आडंबर का मज़ाक उड़ाया है। ख़्वाजा हैदर अली आतिश का मशहूर है “बुत-ख़ाना खोद डालिए मस्जिद को ढाइए/दिल को न तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है” ग़ालिब ने भी कहा था “आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसान होना” दर असल उर्दू शायरी की भक्ति परंपरा इंसानियत और मानवता की पुरज़ोर हिमायत करती है। उर्दू शायरी पर कबीर, सूरदास, रसखान, नानक, बुद्ध और संत रविदास की वैचारिक परंपरा का असर नजर आता है। अमीर खुसरो, वली दकनी से लेकर ग़ालिब, मीर, दर्द और फ़ानी बदायूंनी वगैरह ने अपनी रचनाओं के ज़रिए उस मानवतावादी वैचारिकी को सशक्त किया। हिंदुस्तान की मिट्टी में पैदा होने और फलने-फूलने वाली उर्दू पूर्ण रूप से सेक्युलर भाषा है। इस का विकास विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के प्रभाव से हुआ है। इस लिए ऊर्दू ज़बान को सांझी विरासत का प्रतीक कहना मुनासिब होगा। उर्दू महाकाव्यों और दस्तानों में जनेऊ, भभूत, भस्म, रुद्राक्ष, टीका, तिलक, संदल, हवन, चंदन, जन्मपत्री, सिंदूर, कलावा कुंड, अमावस जैसे धार्मिक मान्यताओं का वर्णन मौजूद है। इंशा अल्ला खां इंशा की दास्तान “रानी केतकी की कहानी” और मीर हसन की मसनवी “सहरुलबयान” हिंदुस्तान की सांस्कृतिक धरोहर का सुन्दर उदाहरण हैं। हिंदुस्तान की साझी संस्कृति के संदर्भ में महाकाव्य “सहरुलबयान” के शेर देखिए:
किया पंडितों ने जो अपना विचार
तो कुछ उंगलियों पर किया फ़िर शुमार
जनपत्र देख कर शाह का
तुला और वृक्षिक पर कर के नज़र
कहा राम जी की है तुम पर दया
चंद्रमा सा बालक तेरे होएगा
साझी विरासत के क्रम में इस बात का जिक्र भी समीचीन होगा कि उर्दू साहित्यकारों ने हिंदू धर्म के तीर्थस्थलों, मंदिरों, शिवालों, मठों, नदियों, घाटों, शहरों, पहाड़ों और उन की आध्यात्मिक मान्यताओं को भी अपनी रचनाओं में श्रद्धापूर्वक स्थान दिया है। उर्दू साहित्य में गंगा और काशी को पवित्रता, विराटता, सुंदरता और संस्कृति का प्रतीक माना गया है। “चिराग़-ए-दैर”(मंदिर का दीपक) मिर्ज़ा ग़ालिब की मशहूर मसनवी लिखी है, जिस में उन्होंने काशी की रूहानियत को खिराजे-ए-अक़ीदत पेश करते हुए इसे जन्नत बताया है। हफीज़ बनारसी ने काशी की गंगा-जमुनी तहज़ीब की अक्कासी करते हुए कहा है “हम ने तो नमाज़ें भी पढ़ी हैं अक्सर/गंगा तेरे पानी से वज़ू कर के” संत कबीर ने भी लिखा है “काशी, काबा एक है, एक है राम-रहीम” उर्दू शायरों ने गंगा पर बेहद उम्दा नज़्में लिखी हैं। हफ़िज़ जालंधरी की “नज़्म” गंगा के चंद शेर प्रस्तुत हैं:
गंगोत्री से निकली कैसी उछल उछल कर
और पर्बतों से उतरी पहलू बदल बदल कर
वो अपनी रौ में बहना ऊँचे सुरों में गाना
चिड़ियों का मस्त रहना सुन कर तिरा तराना
जंगल पहाड़ छोड़े मैदाँ बसाए तू ने
अब और ही तरह के नक़्शे जमाए तू ने
हैं शहर प्यारे प्यारे अक्सर तिरे किनारे
तीरथ तिरे किनारे मंदिर तिरे किनारे
जल है तिरा पवित्र मिट्टी भी तेरी प्यारी
पाकीज़गी की देवी पाकीज़ा है तू सारी
मशहूर हो गई तू हिन्दोस्ताँ की माता
तुझ में हर एक हिन्दू अश्नान को है आता
हिन्दोस्तानियों की हमदम है तू पुरानी
दुनिया में कोई दरिया तेरा नहीं है सानी
रातों को चाँद तारे लहरों में झूमते हैं
फूलों भरे किनारे पैरों को चूमते हैं
सूरज बिखेरता है किरनों के हार तुझ पर
और करती हैं हवाएँ नक़्श-ओ-निगार तुझ पर
किसी भी ज़बान या बोली की लोकप्रियता और अहमियत उस के सांस्कृतिक और सामाजिक सरोकार पर निर्भर करती है। उर्दू हिंदुस्तान की एक ऐसी ज़बान है, जिस में कोई भी धार्मिक किताब अवतरित नहीं हुई। इस ज़बान को हिंदुस्तान के साधु-संतों, नवाबों और यहां के आम जनमानस ने परवान चढ़ाया। यही वजह है कि ऊर्दू की रगों में इस सरज़मीन की कल्चरल डायवर्सिटी लहू बन कर दौड़ रही है। उर्दू की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध करने में दिल्ली और लखनऊ के नवाबों ने भी अद्वितीय भूमिका अदा की। उर्दू के कंपोजिट कल्चर को समझने के लिए उर्दू ड्रामों पर संवाद आवश्यक है। उर्दू में नाटक लेखन की एक बेहद प्राचीन परंपरा रही है। उर्दू नाटककारों ने सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक जैसे विभिन्न विषयों पर नाटक लिखे। उर्दू ड्रामों में हिंदू धर्म के देवी देवता, संस्कृति और दूसरी मान्यताओं को दर्शाया गया है। इस संदर्भ में “राधा कन्हैया” “इंद्र सभा” और”मुग़ल-ए-आज़म” जैसे ड्रामों को बतौर मिसाल पेश किया जा सकता है, जिन में भारत की शानदार सांस्कृतिक रिवायत का उल्लेख मिलता है। अवध के नवाब वाजिद भगवान कृष्ण की लीलाओं से प्रेरित थे। स्वयं द्वारा रचित ड्रामा “राधा कन्हैया” में वाजिद अली कृष्ण का किरदार अदा करते थे। उन्होंने ठुमरी, कथक, रहस, रंगमंच, नृत्य और संगीत जैसे सांस्कृतिक कलाओं को समृद्ध किया। अमानत लखनवी का ड्रामा “इंद्र सभा” हिंदू पौराणिक कथाओं पर आधारित है। ओपेरा रूपी इस नाटक में देवताओं के राजा इंद्र के दरबार को चित्रित करता है।
पद्यश्री और साहित्य अकादमी अवॉर्ड से सम्मानित प्रोफेसर ज्ञानचंद जैन(1923-2007) का शुमार उर्दू के शीर्ष विद्वानों और साहित्यकारों में होता है। ज्ञानचंद जैन उर्दू भाषा और साहित्य की दुनिया में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक उम्दा शायर, भाषाविद, रिसर्चर और समालोचक के तौर पर मशहूर थे। उन्हें कई ज़बानों पर महारत हासिल थी। उर्दू हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा में उन्होंने सैकड़ों किताबें लिखीं। “ज़िक्र-ओ-फिक्र” पर उन्हें 1982 में साहित्य एकेडमी पुरस्कार से नवाजा गया। उन की अदबी ख़िदमात के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें 2002 में पद्यश्री जैसे महत्वपूर्ण पुरस्कार से सम्मानित किया। उन की किताबें देश के तमाम विश्वविद्यालयों में ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन और रिसर्च पाठयक्रम में शामिल हैं। उन की महत्वपूर्ण किताबों में “तहकीक का फन” “आम लिसानियात” “ज़िक्र-ओ-फिक्र” “गालिब शनास मालिक राम” “एक भाषा दो लिखावट दो अदब” “तफ़्सीर-ए-ग़ालिब” “इब्तदाई कलाम-ए-इकबाल” “कच्चे बोल” और “रमूज़-ए-ग़ालिब” वगैरह शामिल हैं।ज्ञानचंद जैन ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से “उर्दू की नसरी दास्तांने” विषय पर पीएचडी की डिग्री हासिल की। उन्होंने ने डी लिट् की उपाधि भी प्राप्त की थी। ज्ञानचंद जैन की शख्सियत और उन की अदबी ख़िदमात पर मुख्तलिफ विश्वविद्यालयों में पी एच डी हो चुकी है। प्रो. ज्ञानचंद जैन ने हमीदिया कालेज भोपाल, उस्मानिया विश्वविद्यालय, जम्मू विश्वविद्यालय, इलाहबाद यूनिवर्सिटी और हैदराबाद विश्वविद्यालय जैसी उच्च शिक्षण संस्थाओं में बतौर डीन और प्रोफ़ेसर अपनी सेवाएं दीं।
उर्दू की साझी विरासत के क्रम में प्रो. गोपीचंद नारंग (1931-2022) का नाम गर्व के साथ लिया जाता है। प्रो. नारंग का शुमार उर्दू के शीर्ष विद्वानों में होता है। प्रख्यात विचारक, आलोचक और भाषाविद के तौर पर गोपीचंद नारंग ने उर्दू साहित्य जगत में उत्तर आधुनिकतावाद की नींव रखी। पोस्ट मॉडरिज्म के जनक के तौर पर उन्होंने ने उर्दू में नए नए साहित्यिक विमर्श पैदा किए। जामिया मिल्लिया इस्लामिया और दिल्ली विश्वविद्यालय में उर्दू के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहे। बेशुमार महत्वपूर्ण किताबें लिखीं। पद्मश्री अवार्ड, साहित्य अकादमी पुरस्कार, इक़बाल सम्मान, ग़ालिब पुरस्कार, सर सैयद एक्सीलेंस पुरस्कार जैसे अहम सम्मान से नवाजे गए। पाकिस्तान ने उन्हें सितार-ए-इम्तियाज़ और राष्ट्रपति स्वर्ण पदक से अलंकृत किया। साहित्य अकादमी और राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद, नई दिल्ली जैसी बड़ी संस्थाओं के चेयरमैन रहे। उन्होंने कई देशों में उर्दू भाषा और साहित्य की नुमाइंदगी की। हिंदुस्तान और पाकिस्तान के विभिन्न विश्वविद्यालयों में गोपी चंद नारंग के साहित्यिक योगदान पर शोध कार्य जारी हैं। उन के व्यक्तित्व और साहित्यिक उपलब्धियों पर आधारित कई विशेषांक और पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
उर्दू के समकालीन ग़ैर मुस्लिम अदीबों में चंद्रभान खयाल और डॉ अजय मालवीय और का नाम बेहद खास है। इन दोनों साहित्यकारों की कृतियों में हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब का अक्स झलकता है। चंद्रभान खयाल जन्म भोपाल के एक गांव में हुआ। तक़रीबन चार दहाइयों से उर्दू भाषा और साहित्य की सेवा कर रहे हैं। उन की शायरी में इंसानियत और मुल्क की गंगा-जमुनी तहज़ीब का गहरा अक्स उभरता है। सुन्दर शिल्प और कला में ढली उन की शायरी हमें ताज़गी का एहसास दिलाती है। मौलिक रचनाएँ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में निरंतरता से प्रकाशित होती रही हैं। चंद्रभान खयाल साहित्य अकादमी, नई दिल्ली में उर्दू एडवाइजरी बोर्ड के कन्वीनर हैं। पूर्व में राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद, नई दिल्ली के वाइस चेयरमैन के पद को भी सुशोभित कर चुके हैं। बहुत सारे साहित्यिक सम्मान और आवर्ड से पुरस्कृत हो चुके हैं। उर्दू साहित्य की विभिन्न विधाओं पर आधारित चंद्रभान खयाल की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। “लोलाक” “एहसास की आंच” “गुमशुदा आदमी की तलाश” “सुलगती सोच के साए” “सोलों का शजर” “सुबह मशरीक की अज़ा” “ताज़ा हवा की ताबीशें” उन की पुस्तक “लोलाक” साझी संस्कृति की खूबसूरत मिसाल है। इस किताब में उन्होंने ने इस्लाम के आख़िरी दूत मोहम्मद साहब की अज़मत और महानता को श्रद्धापूर्वक बयान किया है।
प्रयागराज के डॉ अजय मालवीय इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उर्दू भाषा और साहित्य में डॉक्टरेट हैं। कई पुस्तकों के लेखक डॉ अजय मालवीय वर्तमान में एंग्लो बंगाली इंटर कॉलेज, प्रयागराज में उर्दू के वरिष्ठ प्रवक्ता हैं। डॉ अजय मालवीय गंगा-जमुनी तहज़ीब और सांप्रदायिक सौहार्द के पैरोकार हैं। उर्दू साहित्य के विभिन्न विधाओं शायरी, शोध, आलोचना और अनुवाद के मैदान में उन का खास योगदान है। उन की ग़ज़लों में हिंदुस्तान की मिट्टी की खुशबू रची बसी है। अजय मालवीय के ज़रिए लिखित “उर्दू में राम कथा” “उर्दू में हिंदू धर्म” “है राम के वजूद पर हिन्दोस्ताँ को नाज़” “वैदिक अदब और उर्दू ” और “श्रीमद् भागवत गीता” जैसी किताबें उर्दू की साझी विरासत को गौरवान्वित करती हैं। उर्दू भाषा की सांस्कृतिक जड़ों के संदर्भ में उन की राय विचारणीय है:
“उर्दू भाषा की जीवंत और धड़कती हुई जड़ वैदिक संस्कृति और सभ्यता में विद्यमान है। इस की उपयुक्त जड़ की तलाश में हमें वैदिक संस्कृति और सभ्यता की गहराइयों एवं ऊंचाइयों के अथाह समुद्र में गोता लगाना पड़ेगा तब कहीं जाकर उर्दू शब्द की जड़ का उचित उदगम प्राप्त हो सकेगा। उर्दू शब्द अनंत काल से यात्रा करता हुआ, जिसे अमीर खुसरो ने हिंदी, हिंदवी और ज़बान-ए-देहलवी कहा था। यही उर्दू जब दक्षिण भारत पहुंचती है, दकनी अथवा दक्खिनी नामों से जानी जाती है। इस के बाद गुजरात में गुजरी और हरियाणा में हरियाणवी कही गई। इसी उर्दू का नाम आगे चल कर ज़बान-ए-अहल-ए-हिंदुस्तान, रेख़्ता, ज़बान-ए-उर्दू, ज़बान-ए-मुअल्ला तथा हिंदुस्तानी कहा गया। और अंत में अपने असली रूप उर्दू में मौजूद है।”
(उर्दू भाषा और साहित्य का संक्षिप्त इतिहास, डॉ अजय मालवीय, त्रैमासिक सरस्वती, अक्टूबर-दिसंबर/2024, पेज -121)
संजीव सर्राफ द्वारा स्थापित रेख़्ता फाउंडेशन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उर्दू का झंडा बुलंद कर रहा है। 2012 में स्थापित रेख़्ता फाउंडेशन उर्दू भाषा एवं साहित्य की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित व समृद्ध करने के लिए समर्पित है रेख़्ता की वेबसाइट पर उर्दू की तक़रीबन पांच लाख ई-बुक्स मौजूद हैं। जश्न-ए-रेख़्ता के नाम से नई दिल्ली में हर साल तीन दिवसीय प्रोग्राम होता है। इस अवसर पर तरह तरह के साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। खुशी की बात है कि समकालीन समय में भी उर्दू के प्रति लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है। ख़ास तौर पर रेख़्ता फाउंडेशन ने नई नस्ल को उर्दू भाषा और साहित्य की जानिब आकर्षित किया है। रेख़्ता फाउंडेशन के बैनर तले उर्दू की किताबें भी प्रकाशित होती हैं। संजीव सर्राफ के ऐतिहासिक योगदान के आलोक में उन्हें समकालीन दौर का नवल किशोर कहा जा सकता है।
साहित्य के साथ साथ उर्दू की अकादमिक दुनियां में भी ग़ैर मुस्लिम अध्यापकों और प्रोफेसरों का उचित प्रतिनिधित्व नज़र आता है। बेसिक से उच्च शिक्षा तक हर जगह ग़ैर मुस्लिम एकेडमिशन की नुमाइंदगी मौजूद है। देश के अधिकांश उच्च शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में हिंदू प्रोफ़ेसर नियुक्त हैं। पिछले एक दशक से उर्दू भाषा और साहित्य के प्रति ग़ैर मुस्लिम छात्रों और शोधार्थियों रुझान बढ़ा है। उर्दू में भाषाई और सांस्कृतिक डायवर्सिटी के हवाले से शोध कार्य हो रहे हैं। स्वयं मेरे मार्गदर्शन में दो शोधार्थी रामउग्रह और विशाल भारती उर्दू और दलित डिस्कोर्स के विषय पर रिसर्च कर रहे हैं। आशा है कि उर्दू की सांस्कृतिक विरासत का ये सफर निरंतर जारी रहेगा।
(*ये लेखक के अपने विचार )
डॉ महबूब हसन असिस्टेंट प्रोफेसर
उर्दू विभाग, कला संकाय
दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर
