
- शिक्षक दिवस पर विशेष
लखनऊ, 05 सितम्बर , शिक्षक दिवस यानी शिक्षकों के सम्मान का दिवस. शिक्षकों की महिमा बताने के लिए यह दोहा सबसे अधिक पॉपुलर है कि ” गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पायं , बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय ” गुरु ही गोविंद मतलब भगवान से मिलने का रास्ता बताता है. इसलिए गुरु ईश्वर से भी महान माना गया है और जीवन में गुरु ही आगे बढ़ाने की न केवल प्रेरणा देता है बल्कि शिक्षा भी देता है .
शिक्षक दिवस पर ऐसे शिक्षकों को सम्मानित भी किया जाता है , लेकिन कई बार ऐसा होता है जब शिक्षकों की कर्तव्य निष्ठा, उनकी सत्य निष्ठा, कार्य के प्रति लगन और ईमानदारी को काम ही परेशानी का सबब बन जाता है और उन्हें सताया भी जाता है . आज शिक्षक दिवस के मौके पर हम बात कर रहे हैं ऐसे कर्तव्य निष्ठ, ईमानदार और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक राम प्रकाश त्रिपाठी जी की. उन्नाव जिले के मूल निवासी श्री त्रिपाठी केंद्रीय विद्यालय संगठन के केंद्रीय विद्यालय में एक शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए . उन्होंने शिक्षक के रूप में विद्यार्थियों को शिक्षा देने के कार्य करने में अपनी ईमानदारी और समर्पण के भाव से केंद्रीय विद्यालय संगठन का नाम रोशन किया.

यह सिलसिला लगातार चलता रहा और शिक्षक राम प्रकाश त्रिपाठी जी को केंद्रीय विद्यालय संगठन के सर्वोच्च राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया, लेकिन संगठन में ही कुछ अफसरों को यह त्रिपाठी जी की यह कर्तव्य निष्ठा , पढ़ाई के पढ़ने के प्रति लगन और विद्यार्थियों के प्रति प्यार रास नहीं आया और वह त्रिपाठी के खिलाफ तरह-तरह की शिकायतें करते रहे . नतीजा यह हुआ कि उन्हें केंद्रीय विद्यालय एएमसी लखनऊ से सीधे पोर्ट ब्लेयर स्थित केंद्रीय विद्यालय भेज दिया गया.
सरल शब्दों में कहें तो पोर्ट ब्लेयर को काला पानी की संज्ञा दी जाती है और प्रख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे वीर सावरकर जी को अंग्रेजों ने कालापानी की जब सजा सुनाई तो उन्हें पोर्ट ब्लेयर की जेल में ही रखा गया था . लखनऊ से सीधे पोर्ट ब्लेयर ट्रांसफर से आहत त्रिपाठी जी ने न्याय पाने के लिए CAT का दरवाजा हटाया और उन्होंने न्याय मिला लेकिन केंद्रीय विद्यालय संगठन के कुछ अफसर तो उन्हें हर तरह से परेशान करने पर तुले थे तो फिर वे CAT के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट की शरण में गए . इस मामले में हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई पहुँच गई और दुःख की बात तो ये कि त्रिपाठी जी को एएमसी लखनऊ से रिलीव करने के बाद उन्हें न तो वेतन की व्यवस्था की गई और नहीं उनके मान सम्मान की चिंता की गई.

हालांकि लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट से उन्हें न्याय मिला और पुनः केंद्रीय विद्यालय एएमसी लखनऊ में कार्यभार ग्रहण किया यहां उन्हें उप प्रधानाचार्य पद भी सोपा गया और वह कार्य करते हुए सेवानिवृत्ति किया शिक्षकीय जीवन से जुड़ी सबसे कड़वी घटना है लेकिन त्रिपाठी जी चाह कर भी इसे भूल नहीं पाते हैं और इस बार शिक्षक दिवस पर CampusSamachar.com से चर्चा में उन्होंने अपनी व्यथा कही. उन्होंने बताया कि यह घटना उस समय की है जब उन्हें परेशान करने के लिए केंद्रीय विद्यालय संगठन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिना किसी शिकायत के लखनऊ से सीधे पोर्ट ब्लेयर ट्रांसफर कर दिया गया था और ना तो उन्हें किसी प्रकार की जानकारी दी गई और नहीं इतनी दूर ट्रांसफर की कोई वजह ही बताई गई बल्कि ट्रांसफर होते ही उन्हें एएमसी लखनऊ से तत्काल कार्य मुक्त कर दिया गया .
ऐसे में उन्हें केवल न्यायालय की शरण लेनी पड़ी बल्कि अधिकारियों से भी आग्रह किया गया लेकिन अधिकारियों ने न्याय करने से वंचित रखा और कैट में शरण लेने पर जब न्याय मिला तो उसे न्याय के खिलाफ केंद्रीय विद्यालय संगठन हाईकोर्ट गया हाई कोर्ट के बाद ही मामला सुप्रीम कोर्ट तक लंबे समय तक चला और वहां सत्य की जीत हुई और त्रिपाठी का स्थानांतरण रद्द करते हुए एएमसी लखनऊ में ही तैनात तैनाती बनाए रखने का आदेश दिया गया.

बड़े साहित्यकार हैं त्रिपाठी जी
सेवानिवृत्ति के बाद श्री त्रिपाठी जी अब पूरी तरह से साहित्य साधना में लगे हुए हैं . शिक्षा, साहित्य और संस्कृति से जुड़ी उनकी दर्जनों पुस्तक प्रकाशित हो चुकी हैं . वह कई साहित्यक व सांस्कृतिक संस्थाओं के पदाधिकारी भी रहे हैं वह लगातार अभी इस उम्र में भी साहित्य से जुड़े कार्यों में लगे रहते हैं . अब तक उन्हें कई पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं .
शिक्षक दिवस पर दिया ये संदेश
शिक्षक दिवस के मौके अवसर पर उन्होंने कहा कि एक आदर्श शिक्षक की भूमिका शिक्षा को न केवल आगे बढाने की है बल्कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के साथ सत्य की राह पर चलना सिखाना भी है . उन्होंने कहा कि अपने जीवन में उन्होंने हमेशा सत्य का साथ दिया और यही कारण है कि उन्हें समय-समय पर न केवल प्रताड़ित किया गया बल्कि पोर्ट ब्लेयर भेजना जैसे कालापानी की सजा भी दी गई. त्रिपाठी का कहना है कि वह केंद्रीय विद्यालय संगठन में दशकों तक सेवा करने के बाद मिले पुरस्कारों के प्रति भी अफसरों ने सम्मान नहीं दिखाया पर उन्हें सत्य की राह से कोई डिगा नहीं सका और वे जीते .श्री त्रिपाठी जी अक्तूबर 2003 में सेवानिवृत हुए .
