

- भाषा संस्थान के निदेशक श्री विनय श्रीवास्तव जी के निर्देशन में आयोजित इस कार्यक्रम में विभाजन के दौरान विस्थापित परिवारों के सदस्यों को आमंत्रित कर उन्हें सम्मानित किया गया।
- समाज सेवी सुमित कालरा ने विभाजन विभीषिका को याद करते हुए कहा कि मेरी दादी उस वक्त अनेक प्रकार के कष्टों को झेलते हुए यहां आई,
लखनऊ, 14 अगस्त , भाषा विभाग उत्तरप्रदेश शासन के नियंत्रणाधीन उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान एवं शशि भूषण बालिका विद्यालय डिग्री कॉलेज लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में आज 14 अगस्त 2025 को कॉलेज के सभागार में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर विभाजन विभीषिका: एक त्रासदी विषयक संगोष्ठी का आयोजन वोकिया गया। यह आयोजन मातृ भूमि के उन परिवारों को नमन करते हुए, जिन्हें भारत के विभाजन के दौर में अपने प्राण न्योछावर करने पड़े , उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए मनाया गया। कार्यक्रम का आरंभ सरस्वती देवी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर माल्यार्पण कर किया गया साथ ही चंद्र शेखर आज़ाद, शहीद भगत सिंह इत्यादि देश की स्वतंत्रता के लिए प्राणों का उत्सर्ग करने वाले वीरों को नमन कर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित की गई।
भाषा संस्थान के निदेशक श्री विनय श्रीवास्तव जी के निर्देशन में आयोजित इस कार्यक्रम में विभाजन के दौरान विस्थापित परिवारों के सदस्यों को आमंत्रित कर उन्हें सम्मानित किया गया। समाज सेवी श्री सुमित कालरा ने विभाजन विभीषिका को याद करते हुए कहा कि मेरी दादी उस वक्त अनेक प्रकार के कष्टों को झेलते हुए यहां आई, उनके मुख से उन किस्सों को सुनकर हम सबके रोंगटे खड़े हो जाते थे। यह सही है कि 15अगस्त, 1947को भारत ने आजादी का अमृत पान किया, मगर स्वतंत्रता हमें काफी कठिनाइयो और जुल्मी को सहने के बाद मिली। इस विभाजन ने हजारों परिवारों को अपनी जड़ों से जुदा कर दिया। हजारों महिलाओं को अत्याचार और अपमान सहना पड़ा ,अनेक बच्चे अनाथ हो गए ।यह केवल भौगोलिक विभाजन नहीं था, यह दिलों का भी विभाजन था।

श्री प्रकाश गोधवानी जी ने बताया कि उस समय मेरी आयु चार या पांच साल की रही होगी और तब हम जीविका चलाने के टॉफी बेचते थे या फिर किसी दुकान में इस लिए रख लिया जाता था कि हम ग्राहकों को बुला कर समान लेने के आवाज लगाएं। बहुत ही मुसीबत और कष्ट भरें दिन थे। यह विभाजन त्रासदी की विभीषिका अपने साथ लाया था और हम सब भोगने को मजबूर थे। लगभग डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए, दस लाख से अधिक लोगों की मौत हो गई। आज हमें उस त्रासदी से शिक्षा लेनी चाहिए कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृति न हो। उन्होंने कविता की पंक्तियां दोहराते हुए कहा,
संवेदना जगाने को एक चुभन काफी है।
धरा दुलारने को एक गगन काफी है।।
मुख्य वक्ता डॉ प्रेम कुमार जी ने विभाजन विभीषिका को तथ्य परक ढंग से रेखांकित करते हुए कहा कि आजादी के शोर में हमेशा से दब गई विभाजन विभीषिका को आज स्वर मिला है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सीख होगी। आज़ादी के साथ विभाजन का द्वैध हमेशा के लिए सामने रहना चाहिए ताकि किन दुर्गम रास्तों से हम यहां तक आए हैं, यह याद रहे। इस यात्रा की त्रासदियां ही भविष्य के लिए सीख का काम करेंगी। इस अवसर पर महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ अंजुम इस्लाम ने कहा कि अंग्रेज अपनी फूट डालो और राज करो कि कुत्सित नीति में सफल हो गए। जब कि हम आज भी उस विभीषिका से उबर नहीं पाए। यदि विभाजन न होता तो आतंकवाद भी न होता। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस हमें वैमनस्य, भेद भाव और दुर्भावनाओं को खत्म करने की याद दिलाएगा तथा आपसी सहयोग व सामाजिक समरसता , सद्भाव के लिए प्रेरित करेगा।

इस अवसर पर विद्यालय की छात्राओं ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए व देशभक्तिपरक गीतों का गायन किया। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ सौरभ कुमार मिश्र ने किया। कार्यक्रम में छात्राओं, अध्यापकों, अध्यापिकाओं के साथ ही वरिष्ठ साहित्यकार एवं विस्थापित परिवारों के परिजन उपस्थित थे। सभी लोगों ने कार्यक्रम की सराहना की तथा आगे भी इस तरह के आयोजन किए जाने की इच्छा जताई।
