

- प्रदर्शनी की क्यूरेटर डॉ लीना मिश्र ने बताया कि अरघान प्रदर्शनी दर्शकों के अवलोकनार्थ 06 मई 2025 तक शाम 3 से 7 बजे तक खुली रहेगी।
- कला दीर्घा, अंतरराष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका, लखनऊ एवं गुरुकुल, कला वीथिका, कानपुर का सहआयोजन
लखनऊ/कानपुर, 06 मई 2025, campus samachar.com, कला दीर्घा, अंतरराष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका, लखनऊ एवं गुरुकुल, कला वीथिका, कानपुर द्वारा आयोजित वरिष्ठ कलाकार, कलाचार्य और कला दीर्घा अंतरराष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका के संपादक अवधेश मिश्र ( Dr Awadhesh Misra – Paintings ) की चित्र श्रृंखलाओं के चयनित चित्रों की एकल प्रदर्शनी अरघान का आज दूसरा दिन था। गुरुकुल कला वीथिका, आजादनगर, कानपुर में आज कला प्रेमियों का आना-जाना लगा रहा।
डॉ शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ में ललित कला विभाग के शिक्षक एवं प्रख्यात कलाकार अवधेश मिश्र ( Dr Awadhesh Misra – Paintings ) की विभिन्न श्रृंखलाओं – ग्रामीण-जीवन, विस्थापन, निसर्ग, नगर दृश्य, बचपन की स्मृतियाँ, बिजूका, स्कूल के दिन, लय और बिजूका रिटर्न्स के चयनित चित्र यहाँ प्रदर्शित हैं जो भारतीय संस्कृति के विविध आयामों को उजागर करते कलाप्रेमियों से संवाद करते हैं। वास्तव में अरघान प्रदर्शनी सम्पूर्णता में एक ऐसी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ बच्चे के जन्म से विवाह तक लोक मंगल गीतों से उसका जीवन सींचा जाता है। संस्कारों से उसके जीवन की खुशियां बुनी जाती हैं। खेतों में बुवाई से लेकर बालियाँ पकने और फसल कटने तक अनेक सांगीतिक ताने-बाने से सराबोर त्यौहार मनाए जाते हैं। स्वयं भूखे रहकर भी अतिथि का आतिथ्य किया जाता है। आज भी कोई रिश्तेदार पूरे गाँव का रिश्तेदार होता है और गाँव का बड़ा बूढ़ा किसी और परिवार के संबंध में भी सर्वमान्य जरूरी निर्णय ले लेता है।
बताते चलें कि प्रदर्शनी का मुख्य स्वर बिजूका की पृष्ठभूमि भारतवर्ष के एक बहुत बड़े भू-भाग की संस्कृति और परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती है और युगों से देश और समाज में हो रहे विकास का साक्षी है, बिजूका। बचपन में भूत-पिशाच की कहानियाँ सुने होने से अवधेश बिजूका से डरते थे। उस डर के कारण अवधेश के मानस पटल पर इस रूप ने एक जगह बना ली थी जो उसकी नकारात्मकता और डर को व्यक्ति और व्यवस्था की नकारात्मकता से जोड़ कर देखने लगे।

अवधेश ( Dr Awadhesh Misra – Paintings ) ने कभी बिजूका को एक निरीह प्राणी के रूप में देखा जिसको कोई भी क्षति पहुंचाई जाए, वह विरोध नहीं कर सकता। कहीं वह धोखा लगता है कि जो वह नहीं है, उस रूप में हम उसे देख रहे हैं। कहीं वह डरावना है जो खेतों में पशु पक्षियों को डराता है और समाज में निर्बलों को। अवधेश की चित्र श्रृंखला बिजूका के रूप रंग में भी बदलाव आया है और वह बहकटी नहीं पहने है बल्कि टाई और कोट में नजर आता है, कहीं तो वह राइफल लिए हुए खड़ा रहता है लेकिन उलटबांसी करते हुए चित्रकार ने कहीं उसे ऐसा भी बना दिया है कि उसके सिर पर कौवा बैठा है। यानी अपने वास्तविक मूल्यों और अर्थों को वह छोड़ चुका है। अब दुनिया आगे जा चुकी है, उसका किसी को कोई भय नहीं है, इसीलिए तो कहीं लकड़ी में लटके हुए कपड़े को जानवर खा जा रहा है। तंत्र, समाज और लोगों में पैर पसारती नकारात्मकता से संवेदित हो अवधेश अज्ञेय की ये पंक्तियाँ याद करते हैं – सांप ! तुम सभ्य तो हुए नहीं/ नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया/ एक बात पूछूँ – (उत्तर दोगे?) / तब कैसे सीखा डंसना- विष कहाँ पाया?
प्रदर्शनी की क्यूरेटर डॉ लीना मिश्र ने बताया कि अरघान प्रदर्शनी दर्शकों के अवलोकनार्थ 06 मई 2025 तक शाम 3 से 7 बजे तक खुली रहेगी।

