
कला महाविद्यालय में छापाकला विभाग में जय कृष्ण अग्रवाल, मनोहर लाल भुगरा और बाद में राजन एस फुलारी जैसे प्रिंट मेकर नियुक्त किए गए। वर्तमान में यह पद खाली है।
लखनऊ , 09 अप्रैल , campussamachar.com, कला का हमारे जीवन और समाज से एक गहरा संबंध है। जीवन में सुलभ और सहज बनाने के लिए ना जाने क्या क्या चीजें इंसान ने बना ली है। ऐसे ही प्रचार प्रसार के लिए कला के विभिन्न माध्यमों का भी विकास किया जिसमें छपाई एक महत्वपूर्ण रहा है। एक से अधिक लोगों तक पहुंचने के लिए आज छपाई के अनेक माध्यम हैं। छापाकला जहां मात्र छपाई का माध्यम था आज न केवल कलात्मक माध्यम है बल्कि जनसंचार का भी शक्तिशाली साधन भी है। यह दुनिया के विभिन्न संस्कृतियों में किसी न किसी रूप में समाहित है। भारत में इसका एक समृद्धशाली इतिहास रहा है। जिसकी शुरुआत लकड़ी के ब्लॉक, स्टेंसिल, पत्थर के छपाई थी। आजकाल एक प्रयोगात्मक स्वरूप में है।
इसी छपाई पद्धति को छापा कला जो सर्जनात्मक विकास में सहयोगी बना। इसी छापा कला और मूर्तिकला की एक प्रदर्शनी इन दिनों लखनऊ के कला स्रोत आर्ट गैलरी में चल रही है। इस प्रदर्शनी का उदघाटन Insang Song ने किया। यह प्रदर्शनी कला महाविद्यालय के छापा कला और मूर्तिकला के छात्रों के कलाकृतियों की है। जिसमें छात्रों ने अपने कला अध्यापकों के मार्गदर्शन में अनेक प्रयोग किए हैं। आप इनके प्रयोग इनकी कृतियों में देख सकते हैं। यह खासतौर पर छापा कला की महत्वपूर्ण प्रदर्शनी है। इस प्रदर्शनी में छापा कला के 35 के 69 प्रिंट्स और मूर्तिकला के 11 छात्रों के 15 मूर्तिशिल्प प्रदर्शित किए गए हैं।
छापा कला के छात्र सुहानी सिंह , ऊषा मोदी ,मयंक कुमार , वैशाली सेंगर, श्वेता सिंह,दिव्या सिंह, दीपांजलि, आदित्य कुमार गौतम, साक्षी मौर्या, अनामिका तिवारी,नीता कुमारी, श्रेया गोस्वामी, वंदना, प्राची पटेल,अभिनय सिंह, विवेकानंद रजक ,चन्दन, ऋषभ,ऋषि, सिमरन, अंजली यादव,गौरव, आकाश कुमार, ज्योत्सना, मारिया खातून,रीतू कुशवाहा,अंशिका चौधरी,दिव्यांशी, आरेंद्र चौधरी,हर्षिका सिंह,सृष्टि कुशवाहा,साधना राजपूत,कोमल देवी, वंदना गुप्ता,श्रेयांसी सिंह मूर्तिकला के छात्र में कमल, कपिल शर्मा,अनिकेत पटेल,ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह,श्रेष्ठ मिश्रा,वंशिका सिंह,दृश्या अग्रवाल, हेमंत, कौशिकी द्विवेदी,जय नारायण हैं।
इस प्रदर्शनी का संयोजन छापा कलाकार रवि अग्रहरि जो वर्तमान में कला महाविद्यालय में कला अध्यापक हैं, ने किया है। आइए इस कला महाविद्यालय में छापा कला के स्थापना और विकास के इतिहास से रूबरू होते हैं – छपाई का प्रचलन उत्तर प्रदेश में अंग्रेजों के समय से ही शुरू हुआ था। साथ ही तकनीक के साथ छापा को और विकसित किया गया। उत्तर प्रदेश के कई नगरों के साथ लखनऊ में भी बड़े बड़े छापेख़ाने थे। प्रायः इनमें प्रकाशन सामग्री की ही छपाई होती थी। लेकिन तब यह छपाई लिथो और ब्लॉक प्रिंटिंग प्रोसेस के माध्यम से ज्यादा थी।
बाद में राजकीय कला एवं शिल्प महाविद्यालय में इसी छपाई पद्धति को एक कलात्मक विकास की तरफ अग्रसर करने का प्रयास शुरू हुआ। जिसके लिए कलाकारों का योगदान आज भी सराहनीय है। सर्वप्रथम एल एम सेन का नाम महत्वपूर्ण है इस छापाकला की कड़ी में। वे चित्रकला के साथ साथ छापाकला विधा में भी सक्रिय थे। साथ ही उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य भी किया। वरिष्ठ कलाकार जय कृष्ण अग्रवाल जी ने बताया कि महाविद्यालय में पहले मुद्रण कोर्स चलते थे। जो अख़बार और टेकनीशियन के स्तर पर ही संचालित हो रहे थे।
लिथो प्रोसेस एंड फोटो मैकेनिकल के रूप में जो कलात्मक प्रिंट के लिए प्रयोग किए जाते थे। स्वतंत्रता के बाद 1956 में सुधीर रंजन खास्तगीर के प्रिंसिपल पद पर आने के बाद कला महाविद्यालय में बड़े पैमाने पर सकारत्मक परिवर्तन हुए। उनमें से प्रिंट मेकिंग के प्रति और जागरूकता के साथ छापा कला को व्यावसायिकता के साथ सर्जनात्मक स्वतंत्र अभिव्यक्ति के रूप में विकसित करने का कार्य हुआ। पहले लिथो और काष्ठ ब्लॉक मेकिंग और फोर फोटोग्राफी ही हुआ करता था। ब्लॉक मेकिंग कोर्स फोटोग्राफी विषय पर आधारित था। जिसमें कैमरा और केमिकल प्रोसेस को समझाया जाता था। फोटो डेवलपिंग एंड टेक्नीक प्रिंटिंग, ए एम टी, आर्किटेक्चर, कमर्शियल आर्ट मुख्य कोर्स में थे।
उस वक्त लिथो बहुत व्यापक कोर्स हुआ करता था। फाइन आर्ट और मूर्तिकला एक साथ थे। कला महाविद्यालय में छापा कला की स्थापना हुई। जिसका कार्यभार 1963 में जय कृष्ण अग्रवाल जी को सौंपा गया। जय कृष्ण अग्रवाल जी को प्रिंट मेकिंग में संपूर्ण जानकारी थी। अग्रवाल जी के देखरेख में यह विभाग विकसित होने लगा। बाद में सोमनाथ होर से छापा कला की अन्य विधाओं की जानकारी प्राप्त की। जिससे धीरे धीरे काष्ठ कला, लिथोग्राफी के साथ साथ एचिंग, एक्वांटिंट आदि की भी जानकारी दी जाने लगी। 1970 में राज्य ललित कला अकादमी में भी जय कृष्ण अग्रवाल जी द्वारा प्रिंटमेकिंग वर्कशॉप स्थापित किया गया और आज भी एक प्रिंटिंग मशीन है। लेकिन दुर्भाग्य वस बंद होगया और वहां क्रिएटिव सेंटर बना दिया गया। 1980 में ललित कला अकादमी क्षेत्रीय केंद्र की स्थापना हुई जिसमें अन्य विधाओं के साथ छापाकला का भी वर्कशॉप स्थापित किया गया।
इस वर्कशॉप में आर के सरोज को सुपरवाइजर बनाया गया। कला महाविद्यालय में छापाकला विभाग के अध्यक्ष जय कृष्ण अग्रवाल जी के मार्गदर्शन में प्रारम्भ हुए विभाग से अनेकों छात्रों ने इस विधा में पारंगत हुए जिसमें से पद्मश्री श्याम शर्मा, मनोहर लाल, आर के सरोज,भुगरा, गोपाल दत्त शर्मा, गोगी सरोज पाल, सावित्री पाल, रागिनी उपाध्याय, अफ़रोज़ (पाकिस्तान), किरण राठौर, ज्योति शुक्ल,रंजन विश्वकर्मा,अवनीश सिंह, भूपेंद्र कुमार अस्थाना,अमिता जैसे और भी न जाने कितने छात्र रहे हैं।
कला महाविद्यालय में छापाकला विभाग में जय कृष्ण अग्रवाल, मनोहर लाल भुगरा और बाद में राजन एस फुलारी जैसे प्रिंट मेकर नियुक्त किए गए। वर्तमान में यह पद खाली है। कुछ नए ऊर्जावान कलाकारों सोनल वार्ष्णेय, शिखा पांडेय, रंजन विश्वकर्मा, वर्तमान में गेस्ट फैकल्टी के रूप में रवि अग्रहरि के माध्यम से आज भी यह विधा काफी अच्छा काम कर रहा है छात्रों की रचनात्मकता फल फूल रही है। छात्र छापाकला के समस्त विधाओं इचिंग, लिथो, सेरीग्राफी, उडकट, ड्राई प्वाइंट, मेज़ोटेंट, इंग्रेविंग, लीनो कट, विस्कोसिटी आदि में काम कर रहे हैं।
