
- संघर्ष बिना जीत नहीं है और बिना जीते जीवन नहीं है…
- रामनवमी की हार्दिक बधाई व शुभकामनाओं के साथ
विशेष लेख :
उन्नीसवीं शताब्दी में जब अंग्रेज भोजपुरिया गाँवों से लोगों को मॉरिसस, फिजी आदि देशों में ऊँख की खेती करने भेज रहे थे, तो अपना देश, अपनी संस्कृति छोड़ रहे लोग अपने साथ रामचरितमानस की पोथी ले कर निकले थे। आप उस विश्वास की कल्पना कीजिये जो मिट्टी से उखड़ रहे उन लोगों के भीतर राम के प्रति था। जैसे उस विपरीत परिस्थिति में राम ही रक्षा कर सकते हों, जैसे मानस और मानस के राम अकेले समूची संस्कृति के प्रतिनिधि हों। यूँ ही नहीं जमता यह विश्वास, यूँ ही नहीं बनता कोई राम…
देखिये तो! तात्कालिक विश्व के सबसे प्रतिष्ठित राजकुल का राजकुमार विश्वामित्र के ऋषिकुल की रक्षा के लिए मात्र छोटे भाई को लेकर निकल जाता है। कोई सेना नहीं, कोई सैन्य सामग्री नहीं…
वह जब प्रेम करता है तो जीवन पर्यंत एकपत्नी व्रत के निर्णय के साथ प्रेम करता है। और अपने साथी के प्रति समर्पण इतना कि उसके लिए समुद्र को बांध देता है।
वह मित्रता करता है तो किसी बड़े राजा महाराजा से नहीं, एक निषाद से, शोषित सुग्रीव से, तिरस्कृत विभीषण से…
मर्यादा निर्वहन का चरम यह, कि सौतेली माँ के कहने मात्र से अपने समस्त अधिकारों का त्याग कर सपत्नीक वन को निकल जाता है। किसी से कोई शिकायत नहीं, मन में कोई मैल नहीं…
महलों में रहने वाला राजकुमार वन में पर्णकुटी बना कर रहता है, जङ्गली फल खा कर जीता है, और पशु-पक्षियों से मित्रता करता है…
वन में रहने वाले ऋषियों और वनवासियों पर रावण के क्षत्रपों के अत्याचार के विरुद्ध जब वह अभियान करता है, तो अपने महान राजकुल से कोई सहायता नहीं माँगता, बल्कि उन्हीं शोषित, वंचित और पिछड़े वनवासियों की सेना बना कर विश्व की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति से भिड़ता है।
और शौर्य की पराकाष्ठा देखिये, घर में घुस कर मारता है, सो रहे योद्धाओं को जगा जगा कर मारता है, पाताल से निकाल कर मारता है। और मर्यादा यह कि सोने की लंका जीत लेने के बाद भी वहाँ से एक तृण नहीं उठाता, बल्कि सब विभीषण को जस का तस सौंप कर लौट जाता है।
राम के जीवन में मुख्यतः पाँच स्त्रियां आयीं हैं – ताड़का, अहिल्या, सीता, सबरी और सुपर्णखा। राम पाँचों के साथ अलग अलग व्यवहार करते हैं। राम ताड़का का सुधार करते हैं, अहिल्या का उद्धार करते हैं, सीता का शृंगार करते हैं, सुपर्णखा का तिरस्कार करते हैं, और सबरी पर विचार करते हैं। सबरी के प्रेम को सम्मान देते हुए वे उसे स्नेह के शिखर पर पहुँचाते हैं और उसका जूठा खाते हैं। विश्व की किसी भी सभ्यता के पास ऐसा कोई नायक नहीं जो समाज के सबसे पिछड़े वर्ग की विधवा का जूठा खा कर मुस्कुराता हो।
आम जनमानस में उसका प्रभाव यह है कि जब बौद्ध काल में विरोधी उसके चरित्र पर लांछन लगाने के लिए रामायण में सीता परित्याग जैसे क्षेपक जोड़ते हैं, तब भी उनके मर्यादित स्वरूप पर उँगली उठाने का साहस नहीं कर पाते, और वे ही जोड़ते हैं कि सीता के परित्याग के बाद राम घर में ही वनवास झेलते हुए भूमि पर सोते हैं, किसी उत्सव में शामिल नहीं होते और प्रतिपल सीता के वियोग में जलते हैं।
ये हैं राम, जिनको लिखते समय एक आम भक्त मान-अपमान से ऊपर उठ कर लिख देता है। मन में कहीं कोई भय नहीं कि हम राम पर कलम चला रहे हैं। राम भय नहीं देते, भयमुक्त करते हैं। तभी तो तुलसी बाबा लिखते हैं-
जेहि बिधि नाथ होहिं हित मोरा,
करहूँ सो बेगि दास मैं तोरा ..
राम के लिए “तोरा” शब्द प्रयोग करते समय भय कहाँ है?
मानस में ही राम से ऋषियों, वनवासियों की पीर हरने की याचना करते शरभङ्ग कहते हैं-
सीता राम चरन रति मोरे,
अनुदिन बढ़ऊँ अनुग्रह तोरे …
ये हैं हमारे राम, जो याचक को भी इतनी स्वतंत्रता देते हैं कि वह उन्हें देवता नहीं अपना बच्चा, अपना भाई, अपना मित्र समझता है।
राम आम जनमानस के हृदय में हैं, भारत के कण कण में हैं। वे चइता के ‘ ए रामा sss’ से लेकर निरगुन के ‘ कइसे जइबो ना अनजानी रे डगरिया राम ‘ तक हैं। वे अभिवादन के ‘राम राम’ से लेकर शौर्य के “जय श्री राम’ तक हैं। तभी तो विश्व में सबसे अधिक गाँवों का नाम रामपुर है।
दजला-फ़रात, मिश्र, फारस, मेसोपोटामिया किसी के पास राम जैसा नायक नहीं, न हीं आज स्वयं को धर्म कहने वाली परम्पराओं के पास एक भी ऐसा नायक है जिसने राम जैसी मर्यादा का निर्वाह किया हो।
प्रस्तुति : ललित अग्रवाल, बिलासपुर
