
लखनऊ. भारत तिब्बत संवाद मंच के आह्वान पर शुक्रवार को काला दिवस मनाया गया। यह काला दिवस इसलिए मनाया जाता है, क्योंकि देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तानी सेना ने षडयंत्र से 22 अक्टूबर 1947 को जम्मू कश्मीर पर कबायली हमला किया था। जिसके के कारण गुलाम कश्मीर के लाखों परिवारों को विस्थापित होना पड़ा था। इसलिए जो पिछले 70 वर्षों से आज के दिन को काला दिवस के रूप में मनाते हैं जिसमें हम सब शामिल हैं।
यह वही दिन है जब पाकिस्तानी सेना के इशारे पर कबायलियों ने जम्मू कश्मीर के मुजफ्फराबाद व आसपास के क्षेत्रों पर हमला कर दिया था और कुछ क्षेत्रों को अपने कब्जे में ले लिया था। फिर जम्मू एवं कश्मीर के राजा हरि सिंह द्वारा भारत में विलय की घोषणा के बाद भारतीय सेना ने अपना शौर्य व पराक्रम से खदेड़ दिया। लेकिन दुर्भाग्य था जब तत्कालीन केंद्रीय नेतृत्व ने आधे कश्मीर को लिये बिना ही सेना को आगे बढऩे से रोक दिया। परिणाम स्वरुप देश आज भी पीओके की समस्या से जूझ रहा है।
काश दिल्ली मे बैठा नेतृत्व पीओके पाकिस्तान को उपहार में न देता और भारतीय अपनी सेना को कबायली लुटेरों से पूरा जम्मू एवं कश्मीर खाली कर लेने देता। जिसके बाद बड़ी संख्या में हिंदू परिवारों को गुलाम कश्मीर से विस्थापित होकर इस ओर जम्मू कश्मीर में आना पड़ा था। जो पिछ्ले 70 सालों से अपने ही देश शरणार्थी का जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं। मंच की ओर से डॉ.संजय शुक्ला के नेतृत्व में मंच के कार्यकर्ताओं ने इस हमले में शहीद जवानों एवं हिन्दू परिवारों को शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि दी गई। डॉ.शुक्ला ने कार्यकर्ताओं को कबायली हमले व उन्हें खदेडऩे वाले भारतीय सेना के पराक्रम के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
