“भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः
नवाम्बुभिर्भूमिविलंबिनो घनाः!
अनुद्धता सत्पुरुषाः समृद्धिभिः
स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्!!
जब वृक्षों में फल लगते हैं तो वे फलों के भार से झुक जाते हैं और नये जल से परिपूर्ण बादल भी पृथ्वी पर बरसने के लिये आकाश में नीचे उतर आते हैं। इसी तरह सज्जन और महान व्यक्ति भी समृद्ध होने पर भी नम्र और सहृदय बने रहते हैं क्यों कि परोपकार करने वालों स्वभाव ही ऐसा होता है.
