तीन दिवसीय पिंकफेस्ट 2026 का आयोजन 6 से 8 फरवरी 2026 तक राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर, जयपुर में किया जाएगा।
लखनऊ/ नई दिल्ली , 31 जनवरी, वरिष्ठ कलाकार, कला दीर्घा, अंतरराष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका के संपादक और डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ के कलाचार्य डॉ. अवधेश मिश्र राज्य ललित कला अकादेमी, उत्तर प्रदेश की ओर से इंडिया पिंक फेस्ट, पिंक सिटी इंटरनेशनल फेस्टिवल, जयपुर में आयोजित परिचर्चा भारत बोध, सांस्कृतिक जनचेतना का आधार स्तम्भ के अंतर्गत उत्तर प्रदेश का दृश्यकला परिदृश्य विषय पर वक्ता के रूप में अपने विचार प्रस्तुत करेंगे। तीन दिवसीय पिंकफेस्ट 2026 का आयोजन 6 से 8 फरवरी 2026 तक राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर, जयपुर में किया जाएगा। कला और संस्कृति के इस महापर्व का उद्देश्य परंपराओं, रचनात्मक विशेषज्ञता और समकालीन दृष्टि को नए प्रतिमानों के साथ प्रस्तुत करते हुए वैश्विक संवाद स्थापित करना है। यह उत्सव न केवल स्थापित कलाकारों को गरिमामय मंच प्रदान करता है, बल्कि युवा रचनाकारों के लिए भी ऐसा सृजनात्मक वातावरण निर्मित करता है, जहाँ उनकी प्रतिभा को पहचान और सम्मान मिलता है। राजस्थान की जीवंत लोक-संस्कृति और समृद्ध परंपराओं की पृष्ठभूमि में आयोजित पिंकफेस्ट विश्वभर के विविध कलारूपों की सुंदर, सरस और सजीव प्रस्तुतियों का ऐसा आयोजन है, जहाँ कला-प्रदर्शनियाँ, विचारोत्तेजक संवाद, रचनात्मक कार्यशालाएँ तथा प्रदर्शनकारी कलाओं के सशक्त रूप देखने को मिलेंगे, जो समय की सांस्कृतिक स्मृति में अंकित हो जाएँगे। विश्व के विभिन्न देशों से आए कलाकारों और कला-मर्मज्ञों की सहभागिता पिंकफेस्ट को सांस्कृतिक संवेदनशीलता और सौंदर्यबोध का वैश्विक मंच बनाती है।
राज्य ललित कला अकादेमी, उत्तर प्रदेश की ओर से प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर रहे डॉ. अवधेश मिश्र लगभग तीन दशकों से रचना और विचार दोनों को समान प्रतिबद्धता के साथ साधते हुए भारतीय समकालीन कला में निरंतर सक्रिय रहे हैं। प्रख्यात कलाकार, कला समीक्षक, कलाचार्य और संपादक के रूप में उनकी पहचान स्थापित है। उनकी कला का मूल स्रोत वह गँवई परिवेश है, जहाँ बचपन से किशोरावस्था तक संचित संवेदनाएँ उनकी रचनात्मक चेतना का स्थायी आधार बनती हैं। उनकी कृतियाँ केवल दृश्यात्मक अनुभव नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विमर्श का सघन दृश्य-पाठ हैं।
डॉ. अवधेश मिश्र का व्यक्तित्व उनकी कला की ही तरह संतुलित, अनुशासित और आत्मानुशासित है। मृदुभाषी, संवेदनशील और सामाजिक सरोकारों से युक्त होते हुए भी वे अपने लक्ष्य के प्रति असाधारण रूप से गंभीर हैं। समय-प्रबंधन और नैतिक प्रतिबद्धता का यह दुर्लभ समन्वय उन्हें एक साथ कलाकार, शिक्षक, समीक्षक और संपादक के रूप में प्रभावी बनाता है। उनकी कला-यात्रा का आरंभ ग्रामीण परिवेश में मिट्टी, कोयले और गेरू से बने उन आरंभिक चित्रों से होता है, जहाँ दीवारें और ज़मीन ही उनका पहला कैनवास थीं। अनेक विश्वविद्यालयों से औपचारिक कला-शिक्षा प्राप्त करने के क्रम में डॉ मिश्र ने कॉलेज ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट, लखनऊ से आर्ट मास्टर्स ट्रेनिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से बीएफए और एमएफए, रूहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली से पीएच.डी. तथा इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से डी.लिट. की उपाधि प्राप्त की है। तैल माध्यम में स्पैचुला, रोलर और विविध टेक्स्चर प्रयोगों के माध्यम से उन्होंने आकारों की जकड़न से मुक्त, भावप्रधान चित्र-भाषा विकसित की। लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों पर आधारित उनकी मोनोक्रोम श्रृंखला परंपरा और समकालीन संवेदना के नवाचारपूर्ण संयोजन का सशक्त उदाहरण हैं।

डॉ. अवधेश मिश्र की पहचान का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनका कला-समीक्षक और संपादक के रूप में सक्रिय योगदान है। सन 2000 से प्रकाशित कला दीर्घा, अंतरराष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका का संपादन तथा कला विमर्श, सम्वेदना और कला और पहला दस्तावेज़ जैसी पुस्तकें भारतीय समकालीन कला जगत में मील का पत्थर मानी जाती हैं। उनकी कला का सबसे चर्चित अध्याय विजूका श्रृंखला है, जिसमें खेतों में खड़ा पुतला भारतीय ग्रामीण संस्कृति, भय, सत्ता, व्यवस्था और नैतिक पतन का बहुस्तरीय प्रतीक बनकर उभरता है। अयोध्या, भोपाल, लखनऊ, जयपुर, हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई, पुणे, ठाणे, वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर, बुसान, अमृतसर, खजुराहो, मोहाली, धर्मशाला, बडौदा, भुबनेश्वर, चंडीगढ़, अहमदाबाद, पटना, लन्दन, बर्मिंघम, दुबई, मस्कट, नागपुर, पटियाला, कोलकाता में प्रदर्शित इस श्रृंखला के चित्रों ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान दिलाई।

अब तक अवधेश ने 19 एकल प्रदर्शनियां और सैकड़ों सामूहिक प्रदर्शनियां तथा महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय प्रदर्शनियों और ग्वालियर, अयोध्या, भद्रवाह, वाडा, जयपुर, भुबनेश्वर, शिलोंग, ऋषिकेश, गुआहाटी, धनोल्टी, अल्मोड़ा आदि नगरों में आयोजित कलाशिविरों में भागीदारी निभायी है। डॉ. अवधेश मिश्र के चित्रों के रंग गाँव की मिट्टी से उठे हुए प्रतीत होते हैं, जैसे धूसर, हरा, नीला, पीला, लाल और गहरा स्याह। कागज़ की नाव, फिरकी, झंडियाँ, तख्ती, वर्णमाला, हल और चूल्हा जैसे प्रतीक उनकी कला में उधार नहीं, बल्कि जिए हुए अनुभव हैं। तीन दशकों से अधिक की सृजन-साधना के बावजूद उनकी रचनात्मक ऊर्जा अक्षुण्ण है। वह चित्रण, अध्यापन और लेखन-संपादन के माध्यम से भारतीय समकालीन कला को दीर्घकालिक दृष्टि और वैचारिक समृद्धि प्रदान करते हुए निरंतर सृजनरत हैं।
