
लेख : प्रस्तुति

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन और समृद्ध संस्कृति है। भारतीय संस्कृति में नारी को नारायणी कहा गया है। इस संपूर्ण चराचर जगत् में जहां भी जो कुछ दिखाई देता है, वह उसी आद्याशक्ति की प्रभाव से आलोकित है। भारत वो राष्ट्र है जहां मैत्रेयी, गार्गी, इंद्राणी, लोपामुद्रा जैसी वेद मंत्र दृष्टा विदुषी महिलाएं थी। आधुनिक काल में देखे तो दुर्गावती, अहिल्याबाई, लक्ष्मीबाई, चेन्नम्मा व आध्यात्म के क्षेत्र में मीराबाई, मां शारदा जैसे नामों की एक लंबी श्रृंखला है। इस वर्ष हम पुण्यश्लोका लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की त्रिशताब्दी मना रहे हैं। उनके जीवन कार्यों से सामान्य जनता को परिचित कराने का निर्णय पुण्यश्लोका लोकमाता अहिल्यादेवी होलकर त्रिशताब्दी समारोह समिति ने लिया।
उल्लेखनीय है कि अहिल्याबाई किसी बड़े राज्य की रानी नहीं थी। उनका राज्य छोटा था। फिर भी उन्होंने जो कुछ किया उससे आश्चर्य होता है। शासन व्यवस्था के नाम पर जनता पर अत्याचार हो रहे थे। साधारण गृहस्थ, किसान व मजदूर सिसक रहे थे। न्याय में न शक्ति थी, ना विश्वास। ऐसे कालखंड में विकट परिस्थितियों में अहिल्याबाई ने जो कुछ किया वह चिरस्मरणीय है। दस – बारह वर्ष की आयु में उनका विवाह हुआ। पति का स्वभाव उग्र था। 29 वर्ष की अवस्था में विधवा हो गई। जब वह 42 वर्ष की थी तब पुत्र मालेराव का देहांत हो गया। दामाद यशवंत राव फड़से का भी निधन हो गया और पुत्री मुक्ताबाई सती हो गई। व्यक्तिगत व पारिवारिक रूप से इन विकट झंझावातों के बीच उन्होंने अपने को संभाला और राजरानी का एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया जिनके समक्ष हम सब नतमस्तक हैं। सामाजिक समरसता को आधार मानकर उन्होंने शासन का संचालन किया। वे कृतत्व, सादगी, धर्म के प्रति समर्पण, प्रशासनिक कुशलता ,दूरदृष्टि एवं उज्जवल चरित्र का अद्वितीय आदर्श थी। श्री शंकर आज्ञेवरून ( श्री शंकर जी की आज्ञा अनुसार ) इस राजमुद्रा से चलने वाला उनका शासन हमेशा भगवान् शंकर के प्रतिनिधि के रूप में ही काम करता रहा। उनका लोक कल्याणकारी शासन भूमिहीन किसानों, भीलों जैसे जनजाति समूहों तथा विधवाओं के हितों की रक्षा करने वाला एक आदर्श शासन था। समाज सुधार, कृषि सुधार, जल प्रबंधन, पर्यावरण रक्षा, जनकल्याण और शिक्षा के प्रति समर्पित होने के साथ-साथ उनका शासन न्यायप्रिय भी था।
अहिल्याबाई ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भारत भर के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों में मंदिर व घाट बनवाए। कुओं और बावड़ियों का निर्माण किया, मार्ग बनवाए । भूखों के लिए अन्नक्षेत्र खोलें, प्यासों के लिए प्याऊ की व्यवस्था कराई। मंदिरों में पुजारियों की नियुक्ति और शास्त्रों के मनन – चिंतन व पठन- पाठन की व्यवस्था कराई। आत्म – प्रतिष्ठा के झूठे मोह को त्याग कर वे सदा न्याय का प्रयत्न करती रही। उनके आचरण व कार्यों को देखकर जनता इन्हें “देवी” कहने लगी क्योंकि इतना बड़ा व्यक्तित्व जनता ने देखा नहीं था। मानव मन की पीड़ा का उन्हें पता था। हिंदू समाज के लिए वह प्रेरक रही। इसीलिए उन्हें पुण्यश्लोका की उपाधि मिली।
अहिल्याबाई का जीवन अद्भुत, अलौकिक व अकल्पनीय है। अहिल्याबाई होल्कर जी के समय में समाज में कुरीतियों और रूढ़ियों के कारण दहेज प्रथा, जाति के आधार पर ऊँच-नीच, सती प्रथा जैसी बातें हमारे समाज में घर कर गई थी। समाज में व्याप्त कुरीतियों के निर्मूलन, धर्म के प्रति श्रद्धा जागरण व हिंदू समाज को समरस, सजग, सचेत, समृद्ध, स्वाभिमानी और स्वावलंबी बनाने के लिए अपना पूरा जीवन लोकमाता ने लगा दिया। अहिल्याबाई होल्कर का संपूर्ण जीवन वर्तमान भारत के युवक – युवतियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
अहिल्याबाई होलकर के जीवन में “देवी रूप” के विराट स्वरूप का प्रादुर्भाव हुआ। महिलाओं की सेना बनाना हो या फिर दक्षिण भारत व पश्चिम भारत से कुशल शिल्पकारों को बुलाकर अपने राज्य के कुटीर उद्योगों का विकास करना हो , अहिल्याबाई होल्कर की शासन दृष्टि अद्भुत रही। अहिल्याबाई होल्कर जी ने जनता के लिए जो कुछ भी किया वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। संपूर्ण भारत राष्ट्र और सनातन उनके चिंतन में समाया हुआ था। वह एक दूरदर्शी महिला थी। दिन – रात आने वाली पीढ़ियों और भारतवर्ष के भविष्य के चिंतन में लगी रहती थी। वह राष्ट्र और संस्कृति को अपने राज्य क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर मानती थी। वह कहती थी कि समस्त भारतीय जनता एक है। यह विचार कि हमारा राज्य बड़ा है और उनका छोटा ; हम महान है और वह जंगली ; इस प्रकार का भेदभाव विष के समान है जो एक दिन हम सबको नरक में धकेलेगा।
लोकमाता बचपन से ही शिव भगवान के प्रति श्रद्धा रखती थी। इस श्रद्धा का दर्शन न सिर्फ उनके जीवन में परिलक्षित होता है बल्कि उनके पारिवारिक मूल्यों, सामाजिक दृष्टिकोण व शासन की नीति में भी अभिव्यक्त होता है। शिव भगवान जैसा भोलापन और सरलता उनके राज्य की जननीतियों में दिखाई देता है और शिव भगवान का रौद्र स्वरूप – तांडव नृत्य का स्वरूप विभिन्न युद्धों में विजय की गाथा के रूप में भी प्रकट होता है। लोकमाता द्वारा भारतवर्ष के विभिन्न मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया गया व नए मंदिरों की स्थापना भी की गई। कुछ धार्मिक एवं सामाजिक कार्य निम्नलिखित हैं :
(१) श्री सोमनाथ मंदिर – १७८३ ई० में श्री सोमनाथ मंदिर की जर्जर दशा देखकर उसका पुनर्निर्माण करवाया। एक गुप्त स्थल पर मूर्ति की स्थापना की गई और कई मूल्यवान ढाँचे भूमिगत बनाए गए ताकि हमलावरों की नज़र न पड़े।
(२) श्री काशी विश्वनाथ मंदिर – १७८० ई० में ज्ञानवापी मस्जिद के बगल में (यह मस्जिद श्री विश्वेश्वर मंदिर को तोड़ कर औरंगजेब के द्वारा बनवाया गया) श्री काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर के व्यय केलिये आमदनी की भी व्यवस्था की।
(३) आलमपुर (मध्य प्रदेश) – हरिहरेश्वर मंदिर, बटुक मंदिर, मल्हारी मार्तण्ड मंदिर, सूर्य मंदिर, श्री राम मंदिर, हनुमान मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, मारुती मंदिर, श्री नरसिंह मंदिर, खंडेराव मार्तण्ड मंदिर, इत्यादि।
(४) अमर कंटक (मध्य प्रदेश) – श्री विश्वेश्वर मंदिर, कोटितीर्थ मंदिर, गोमुखी मंदिर बनवाया।
(५) अम्बा गाँव – दीपक की व्यवस्था की।
(६) आनंद कानन – श्री विश्वेश्वर मंदिर बनवाया।
(७) अयोध्या (उत्तर प्रदेश) – श्री राम मंदिर, श्री त्रेता राम मंदिर, श्री भैरव मंदिर और सिद्धनाथ मंदिर बनवाये।
(८) बद्रीनारायण (उत्तराखंड) – श्री केदारेश्वर और श्रीहरि मंदिर बनवाये।
(९) बेरुल (कर्नाटक) – श्री गणपति मंदिर, श्री पांडुरंग मंदिर, जलेश्वर मंदिर, खंडोबा मंदिर, तीर्थराज मंदिर और अग्नि मंदिर बनवाये।
(१०) भानपुरा – नौ मंदिर बनवाया।
(११) भरतपुर – एक मंदिर बनवाया।
(१२) भुसावल – चांगादेव मंदिर बनवाया।
(१३) चंदवाड वाफेगांव – विष्णु मंदिर और रेणुका मंदिर बनवाये।
(१४) चौंडी – चौंडेश्वरी देवी मंदिर, सिंहेश्वर महादेव मंदिर और अहिल्येश्वर मंदिर बनवाये।
(१५) चित्रकुट (मध्य प्रदेश) – श्री रामचन्द्र की प्राणप्रतिष्ठा कराई।
(१६) एलोरा – लाल पत्थर का मंदिर बनवाया।
(१७) गंगोत्री – विश्वनाथ मंदिर, केदारनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर और भैरव मंदिर बनवाये।
(१८) गया – अहल्यादेवी मंदिर, विष्णुपद मंदिर – जीर्णोद्धार, श्री रामजानकी एवं लक्षमण की मूर्तियों वाले एक मंदिर का निर्माण कराया।
(१९) पुष्कर – गणपति मंदिर बनवाया।
(२०) गोकर्ण – रेवालेश्वर महादेव मंदिर बनवाया।
(२१) ग्रूणेश्वर – शिवालय तीर्थ का निर्माण कराया।
(२२) हंडिया – सिद्धनाथ मंदिर बनवाया।
(२३) हृषिकेश – अनेक मंदिर, श्रीनाथजी मंदिर और गोवर्धन राम मंदिर बनवाये।
(२४) इंदौर – अनेक मंदिर बनवाये।
(२५) जगन्नाथपुरी – श्री रामचंद्र मंदिर बनवाया।
(२६) जलगाँव – श्री राम मंदिर बनवाया।
(२७) जेजुरी – मल्हारगौतमेश्वर मंदिर, विट्ठल मंदिर, मार्तण्ड मंदिर, मल्हार मंदिर और जनाई महादेव मंदिर बनवाये।
(२८) काशी – काशी विश्वनाथ मंदिर, श्री तारकेश्वर मंदिर, श्री गंगाजी मंदिर, अहिल्या मंदिर, द्वारकेश्वर मंदिर, गौतमेश्वर मंदिर और अन्य कई महादेव मंदिर बनवाये।
(२९) कुरूक्षेत्र (हरियाणा) – शिव शांतनु महादेव मंदिर बनवाया।
(३०) महेश्वर – राजराजेश्वर मंदिर एवं अन्य सैकड़ों मंदिर बनवाये।
(३१) ममलेश्वर महादेव – दीपक की व्यवस्था की।
(३२) मनसा – सात मंदिर बनवाये।
(३३) मिरी (अहमदनगर) – भैरव मंदिर बनवाया।
(३४) नेमावर (मध्य प्रदेश) – शिव मंदिर बनवाया।
(३५) नीलकंठ महादेव – शिवालय और गोमुख बनवाये।
(३६) नैमिषारण्य (उत्तर प्रदेश) – महादेव माडी बनवाया।
(३७) ओंकारेश्वर – ममलेश्वर महादेव, अमलेश्वर, और त्रयम्बकेश्वर का जीर्णोद्धार कराया, गौरी सोमनाथ मंदिर बनवाया।
(३८) पंचवटी – श्री राम मंदिर, गोरा महादेव मंदिरऔर विश्वेश्वर मंदिर बनवाये।
(३९) पंढरपुर (महाराष्ट्र) – श्री राम मंदिर बनवाया।
(४०) प्रयाग – विष्णु मंदिर बनवाया।
(४१) रामेश्वर (तमिलनाडु) – श्री हनुमान मंदिर और श्री राधाकृष्ण मंदिर बनवाये।
(४२) रामपुरा – चार मंदिर बनवाये।
(४३) संभल – लक्ष्मीनारायण मंदिर बनवाया।
(४४) संगमनेर – श्री राम मंदिर बनवाया।
(४५) सरधना (मेरठ) – चंडी देवी मंदिर बनवाया।
(४६) सौराष्ट्र (गुजरात) – श्री सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और उनकी प्राण प्रतिष्ठा कराई।
(४७) दारुकावन – श्री नागनाथ (सन १७८४ में पूजा शुरू)।
(४८) पराली (महाराष्ट्र) – श्री बैजनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।
(४९) ओझर – श्री विघ्नेश्वर मंदिर में दीप व्यवस्था की।
(५०) सिंहपुर – शिव मंदिर बनवाया।
(५१) सुल्पेश्वर – महादेव मंदिर बनवाया।
(५२) सुलतानपुर (खानदेश) – मंदिर बनवाया।
(५३) तराना – तिलभांडेश्वर शिव मंदिर, खेड़ापति, श्री राम मंदिर और महाकाली मंदिर बनवाये।
(५४) उज्जैन (मध्य प्रदेश)- चिंतामणि गणपति, जनार्दन, श्रीलीला पुरूषोत्तम, बालाजी तिलकेश्वर,
रामजानकी रास मंडल, गोपाल, चिटनीस, बालाजी, अंकपाल, शिव और कई अन्य मंदिर बनवाये।
(५५) वृन्दावन (मथुरा) – चैनबिहारी मंदिर बनवाया।
(५६) गुणेश्वर – शिवालय तीर्थ बनवाया।
(५७) देवी अहिल्याबाई ने गंगाजल की काँवड़ को निर्धारित स्थान पर निर्धारित समय पर पहुँचाने की व्यवस्था स्थायी रूप से की। रामेश्वर से बद्री-केदार तक ऐसे ३४ स्थानों के नाम उपलब्ध हैं।
देवी अहल्याबाई होल्कर के सामाजिक कार्य
देवी अहल्याबाई होल्कर के द्वारा समाज कल्याण के लिए किये गए कार्य भी उतने ही यशस्वी हैं।
(१) वृंदावन में ५७ सीढ़ियों वाली एक पत्थर की बावड़ी (कुआँ) का निर्माण कराया।
गरीबों का पेट भरने केलिये भोजनालय स्थापित किया।
(२) त्र्यम्बक (नासिक के नजदीक) में पत्थर की दीवार वाले तालाब का निर्माण कराया और पुल बनवाया।
(३) मध्यप्रदेश के आलमपुर (भिंड) में गरीबों में भोजन और अन्य जरूरी वस्तुएं वितरित करने केलिये एक सदावर्त शुरु कराया।
(४) पुष्कर में धर्मशाला का निर्माण कराया और उद्यान लगवाया।
(५) हरिद्वार में एक पत्थर का मकान बनवाया, जहाँ श्रद्धालु पिण्डदान करने आते थे। कुशावर्त घाट एवं एक बड़ी धर्मशाला बनवायी।
(६) काशी में मणिकर्णिका कुण्ड और मणिकर्णिका घाट का निर्माण कराया। महादेव मंदिर के पास मंदिर घाट, दशाश्वमेध घाट, जनाना घाट, अहिल्या घाट, उत्तरकाशी धर्मशाला, रामेश्वर पंचकोशी धर्मशाला, कपिलाधरा धर्मशाला, शीतलाघाट आदि का भी निर्माण कराया।
(७) बद्रीनाथ में यात्रियों के रुकने केलिये उन्होंने कई भवनों का निर्माण कराया। धर्मशालाओं (रंगदाचटी, बिदरचटी, व्यासगंगा, तंगनाथ, पवाली) का निर्माण कराया।, मनु कुंड (गौरकुंड, कुंडचत्री) का निर्माण कराया।
(८) लगभग ६०० वर्षों तक जो छत्र भगवान जगन्नाथ की शोभा बढाता रहा, उसे देवी अहिल्याबाई होल्कर ने ही दान किया था।
(९) केदारनाथ धाम में एक धर्मशाला एवं कुण्ड का निर्माण कराया।
(१०) देवप्रयाग में उन्होंने गरीबों केलिये भोजनालय स्थापित कराया, उद्यान लगवाए, गर्म पानी के कुंड बनवाए, और गायों के लिए चारागाह भूमि की व्यवस्था की।
(११) गंगोत्री में आधा दर्जन धर्मशालाएँ बनवाईं।
(१२) कानपुर के बिठूर में ब्रह्मा घाट एवं कई अन्य घाट बनवाए।
(१३) भदैनी में एक कूप का निर्माण कराया।
(१४) मध्यप्रदेश के धार स्थित चिकल्या में नर्मदा परिक्रमा हेतु आने वाले भक्तों केलिये भोजनालय की स्थापना की।
(१५) सुल्पेश्वर में अन्नक्षेत्र की स्थापना कर भोजनालय की व्यवस्था की।
(१६) मध्यप्रदेश के खरगौन स्थित मंडलेश्वर में विश्रामालय बनवाए।
(१७) ओंकारेश्वर में उन्होंने पूजा-पाठ की कई व्यवस्थाएं की, धर्मशालाएँ और कुएँ बनवाए।
(१८) मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी के किनारे स्थित हंडिया में धर्मशाला, घाट और भोजनालय बनवाए।
(१९) कोलकाता से लेकर काशी तक श्रद्धालुों के लिये राजमार्ग का निर्माण करवाया। जगह-जगह पर कई पुल भी बनवाए।
(२०) उत्तर भारत से लाए गए गंगाजल से रामेश्वरम् में शिवलिंग के दैनिक अभिषेक की व्यवस्था कराई।
(२१) अमरकंटक (मध्यप्रदेश) में धर्मशाला और कुण्ड बनवाए।
(२२) अयोध्या (उत्तर प्रदेश) – सरयु घाट, स्वर्ग द्वारी मोहताजखाना, और धर्मशालाओं का निर्माण कराया।
(२३) बीड – एक घाट का जीर्णोद्धार कराया।
(२४) बेरुल (कर्नाटक) – कुंड का निर्माण कराया।
(२५) भानपुरा – धर्मशाला बनवाया।
(२६) भरतपुर – धर्मशाला और कुण्ड बनवाया।
(२७) भीमाशंकर – गरीबों केलिये घर बनवाया।
(२८) बुरहानपुर (मध्य प्रदेश) – घाट और कुंड बनवाए।
(२९) चौंडी – धर्मशाला और घाट बनवाए।
(३०) सिखल्दा – अन्नक्षेत्र स्थापित किया।
(३१) द्वारका (गुजरात) – मोहताजखाना, पूजा घर और पुजारी को कुछ गाँव दिए।
(३२) गंगोत्री – अनेक धर्मशालाओं का निर्माण कराया।
(३३) गोकर्ण – होल्करबाड़ा, उद्यान एवं गरीबखाना बनवाए।
(३४) इंदौर – कई घाट बनवाए।
(३५) जामघाट – भूमिद्वार बनवाए।
(३६) जामवगाँव – रामदास स्वामी मठ केलिये दान दिया।
(३७) जगन्नाथपुरी – धर्मशालाओं का निर्माण कराया और उद्यान लगवाए।
(३८) जेजुरी – मल्हार झील।
(३९) कुम्हेर – कुआं और राजकुमार खंडेराव का स्मारक बनवाया।
(४०) कुरूक्षेत्र (हरियाणा)- पंचकुंड घाट, लक्ष्मीकुंड घाट बनवाई।
(४१) महेश्वर – सैकड़ों मंदिर, घाट, धर्मशालाएं और घर बनवाये।
(४२) मंडलेश्वर – शिव मंदिर घाट बनवाया।
(४३) नाथद्वारा – अहल्याकुंड और कुआँ बनवाये।
(४४ ) नैमिषारण्य – निमसार धर्मशाला, गो घाट, चक्रीतीर्थ कुण्ड बनवाये।
(४५) नीमगाँव (नासिक) – कुआँ खुदवाई।
(४६) ओजर (अहमदनगर) – दो कुएँ और कुण्ड बनवाये।
(४७) पंचवटी – रामघाट एवं धर्मशालाएं बनवाई।
(४८) पंढरपुर – तुलसीबाग, होल्करवाड़ा, सभा मंडप, धर्मशाला और मंदिर केलिये चाँदी के बर्तन दिये।
(४९) पिंपलास (नासिक) – कुआँ खुदवाई।
(५०) प्रयाग – धर्मशाला, बगीचा, धर्मशाला घाट और महल बनवाये।
(५१) पुणे – घाट बनवाई।
(५२) पुणताम्बे (महाराष्ट्र) – गोदावरी नदी पर घाट बनवाये।
(५३) रामेश्वर – धर्मशाला, कुआँ, बगीचा बनवाये।
(५४) रामपुरा – धर्मशाला और गरीबों केलिये घर बनवाये।
(५५) रावेर – केशव कुण्ड बनवाई।
(५६) सकरगाँव – कुआँ खुदवाई।
(५७) संभल – दो कुएँ खुदवाए।
(५८) सप्तश्रृंगी – धर्मशाला बनवाई।
(५९) श्री शंभु महादेव पर्वत शिगनापुर (महाराष्ट्र) – कुआँ खुदवाई।
(६०) सिंहपुर – घाट बनवाए।
(६१) टेहरी (बुंदेलखण्ड) – धर्मशाला बनवाई।
(६२) उज्जैन – १३ घाट, कुआँ और कई धर्मशालाएँ बनवाए।
(६३) वृन्दावन – कालियादेह घाट, चीरघाट और कई अन्य घाट, धर्मशाला और अन्नक्षेत्र स्थापित किये।
(६४) वाफेगांव (नासिक) – होल्कर वाडा बनवाया और एक कुआँ खुदवाई।
(६५) कर्मनाशा नदी पर पुल बनवाया।
(६६) उन्होंने कितने ही गाँव, जमीन और मकानों की आमदनी की व्यवस्था की, जो कि सैंकड़ों वर्षों तक चलती रही और आज भी कई जगह चली आ रही है।
(६७) ग्रीष्म ऋतु केलिए कई जगह प्याऊ का निर्माण कराया।
(६८) शीत ऋतु में वे गरीबों में कम्बल, रजाइयाँ और गर्म कपड़ों का वितरण करती थीं।
(६९) कुछ खेतों में खड़ी फसलों को खरीद कर वे चिड़ियों के चुगने हेतु छोड़ देती थीं।
(७०) मछलियों के चारे केलिये उन्होंने जगह जगह व्यवस्था करवाई थी।
(७१) खेतों की सिंचाई केलिये उन्होंने अनेक जगह तालाब बनवाए।
(७२) देवी अहिल्याबाई ने किसानों के लिये कई योजनाएँ चलाई जिसके अनुसार किसानों को खेती करने केलिये राज्य धन देता था और फिर उपज भी बाँटी जाती थी। उन्होंने कई राज्य कर भी समाप्त कर दिए थे जिसके कारण मालवा राज्य बहुत समृद्ध हो गया था।
(७३) देवी ने कभी किसी को मृत्युदंड नहीं दिया। उन्होंने कैदियों से शपथ लेकर उन्हें छोड़ने का काम किया।
(७४) देवी अहिल्याबाई ने विद्वानों को राज्याश्रय दिया। विद्वानों को उन्होंने सम्मानपूर्वक महेश्वर में आमंत्रित किया, उनमें शास्त्र, व्याकरण, पुराण, कीर्तन, वेदान्त, ज्योतिष, वैद्यक आदि विषयों के लगभग २० विद्वानों का उल्लेख मिलता है।
(७५) देवी अहिल्याबाई होल्कर के समय में राज्याश्रय पाकर महेश्वर का वस्त्र उद्योग बहुत समृद्ध हुआ। मुलायम नरम सूती-रेशमी साड़ियाँ, हाथकरघा का कपड़ा लोकप्रिय हुआ। उन्होंने बुनकरों को अनेक सहूलियतें दी। कपड़े का दर्जा, उसके मूल्य के बारे में वे बहुत सतर्क रहकर पूछताछ करती थीं। “चालू द्या होल्करी टाकी” — शिल्पकारी का काम अनवरत चले, यह होल्करों का नियम था। शिल्पकला विकसित हुई, साथ ही हजारों शिल्पियों, कारीगरों, एवं मजदूरों को अपूर्व लाभ मिला।
(७५) एक पत्र में उन्होंने आज्ञा दी थी – “कैदियों की स्त्रियों और संतानों को प्रतिदिन एक सेर ज्वार प्रति व्यक्ति दिया जाए।” कैदियों की स्त्रियाँ और बच्चे भूखे न रहें – उन्हें इसका खयाल रहता था। कैदियों के प्रति सहृदयता का व्यवहार कर उनकी अपराधी प्रवृति कम करने का उनका प्रयोग था।
(७६) देवी अहिल्याबाई के काल में मुद्रण कला नहीं विकसित होने के कारण हस्तलिखित ग्रंथ दुर्लभ और मूल्यवान थे। देवी ने अपने दरबार में नकलची रखकर अनेक ग्रंथों का संग्रह किया। पुस्तकों का संग्रह होने के साथ-साथ उत्तम लेखनिकों को इससे जीविका का साधन मिल गया।
(७७) देवी अहिल्याबाई अपने निजी धन से अखंड दान करती थीं। अन्न छत्र चलाती थीं। छोटे-बड़े तीर्थ स्थानों पर आवश्यकता के अनुसार मदद करती थीं। वह गरीबों को अन्नदान करती थीं, त्योहारों पर मिष्टान्न भोजन भी मिलता था। ग्रीष्मकाल में मार्गों पर स्थान-स्थान पर प्याऊ की व्यवस्था थी। ठंड के मौसम में आश्रित तथा गरीब और अपाहिज जनों को गर्म कपड़े प्राप्त होते थे।पशुओं केलिये चारागाह थे, पक्षियों केलिये लहलहाते खेत रखे जाते थे, जलचरों को आटे की गोलियाँ खिलाई जाती थी। ग्रीष्मकाल में देवी के सेवक किसानों को, बैलों को पानी पिलाते थे।
मनुष्य से लेकर पशु-पक्षी, जलचर तक उनकी दया के अधिकारी थे।
इसी प्रकार लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर ने धार्मिक कार्यों के अलावा सामाजिक कार्य भी किया। शासन की नीतियों में भी आमूलचूल परिवर्तन करके सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नींव रखी और भारत को सशक्त बनाया। लोक माता की चेतना भारत के जन-जन में व्याप्त है। चाहे जनता उसे जानती हो या ना जानती हो लेकिन भारत में रहने वाले हर भारतवासी को कहीं ना कहीं लोकमाता द्वारा किए गए कार्यो ने स्पर्श किया है। भारत के किसी कोने में किसी तीर्थ यात्री ने बनाए गए धर्मशाला में आराम किया है तो किसी ने लोकमाता द्वारा लगवाए गए प्याऊ से अपनी प्यास बुझाई है।
लोकमाता ने जिन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया था, उन मंदिरों से न जाने कितनी जीविकाएं चलती हैं। यदि वे मंदिर ना होते तो मंदिर के आसपास बनने वाली अर्थव्यवस्था भी ना होती। फूल बेचने वाले, मिठाई व फल बेचने वाले, यातायात साधन में लगे लोगों को रोजगार ही न मिल पाता। लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के जीवन चरित्र को देखकर लगता है कि उनका व्यक्तित्व व कृतित्व अखिल भारतीय स्तर का रहा है। लोकमाता महिला सशक्तिकरण का अद्भुत उदाहरण है। उनके अंदर सनातन संस्कृति की देवियों का अद्भुत सम्मिश्रण देखने को मिलता है। लक्ष्मी के रूप में उन्होंने अपने राज्य के कोषागारों को संपन्न किया। सरस्वती के रूप में उन्होंने कई सृजनात्मक कार्य किये जिससे लोगों में सांस्कृतिक जागृति आई। काली या दुर्गा के रूप में उन्होंने अपने राज्य की आक्रमणकारियों से रक्षा करी। लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के श्री चरणों में मैं सादर नमन करता हुआ यह प्रार्थना करता हूं कि उनकी चेतना हम सभी भारतीयों में बस कर, हमें राष्ट्र के लिए कार्य करने की प्रेरणा देती रहे।।।
